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संस्कृत को भारत की पहचान बनाओ, धर्म में मत बांटो

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मेरठ। संस्कृत को किसी पार्टी या विचारधारा से न जोड़ें। संस्कृत को संप्रदाय या धर्म में मत बांटो। हिमालय जैसे भारत का रक्षक है और गंगा श्रद्धा का भाव है, इसी तरह से संस्कृत भारत की आत्मा है। यह बात बुधवार को चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी (सीसीएसयू) में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा आयोजित कार्यक्रम में पहुंचे पद्मश्री रमाकांत शुक्ल ने कही।
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पद्मश्री शुक्ल ने कहा कि संस्कृत की रक्षा करना देश और सीमाओं की रक्षा करना जैसा है। ऐसे में किसी की भी सरकार हो, संस्कृत को बढ़ावा देने की जरूरत है। संस्कृत को बढ़ावा तब तक नहीं मिल सकता है जब तक विद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षकों के रिक्त पदों को नहीं भरा जाएगा। जब शिक्षक ही नहीं होंगे तो संस्कृत सिखाएगा कौन। संस्कृत के सामने प्रचार और रोजगार दोनों की समस्या है। बचपन से जो शिक्षा दी जाती है उसे बच्चा बहुत जल्द सीखता है। ऐसे में पहली कक्षा से संस्कृत को लागू करने की जरूरत है। सरकारी नौकरियों में चाहे वह आईएएस या आईपीएस हों या दूसरे अधिकारी, इन सेवाओं में संस्कृत का एक कोर्स क्वालीफाई करना अनिवार्य होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए घर से भी शुरुआत करनी होगी। पहले मां सुबह को घर में कोई न कोई भजन गाती थी। बच्चा मां से बहुत सीखता है। ऐसे में कोई न कोई एक संस्कृत का श्लोक घर में बच्चों को जरूर सिखाएं। कक्षा नौ में हिंदी या संस्कृत का विकल्प होना चाहिए। संस्कृत लेने वाले विद्यार्थियों को हिंदी विषय वाले सारे लाभ दिए जाएं तो इसकी तरफ छात्रों का रुझान बढ़ेगा। इससे जो हिंदी भाषी राज्य नहीं हैं, वे संस्कृत का विकल्प लेंगे।
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...वह हिंदी अपने आप समझ लेता है
पद्मश्री शुक्ल ने कहा कि जो संस्कृत पढ़ लेता है वह हिंदी अपने आप समझ लेता है। संस्कृत भारत की आत्मा है। संस्कृत में सारा भारत का ज्ञान विज्ञान समाहित है। संस्कृत के महत्व को हर व्यक्ति स्वीकार करता है। कंप्यूटर सारी दुनिया में हैं। हमसे बड़े आविष्कार दूसरे देशों में हैं। लेकिन संस्कृत तो हमारा खजाना है, इसकी रक्षा सबको करनी चाहिए। शिक्षा, प्रचार, ग्रंथ प्रणयन और प्रश्नोत्तर के जरिए संस्कृत को जन-जन तक पहुंचाने की जरूरत है। संस्कृत के विद्वानों का कर्तव्य है कि दूसरे विषयों में छात्रों को उनके सिलेबस के हिसाब से ऐसा लिखकर दें ताकि उनको पढ़ने में रुचि आए। उन्होंने कहा कि सीसीएसयू से उनका पुराना लगाव है। खुर्जा निवासी होने के कारण उन्होंने स्नातक वहीं से किया। एमए संस्कृत उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से किया।
विश्व गुरू तभी बनेगा भारत जब...
कार्यक्रम में आए स्वामी नारायण दत्त शर्मा ने कहा कि संस्कृत आचारवान बनाती है। भारत विश्व गुरू तभी बनेगा जब संस्कृत का प्रचार होगा। आज लोगों में आचरण की कमी है। यह भी संस्कृत से ही बढ़ाया जा सकता है।
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