वहीं, शंका समाधान के दौरान एक अनुयायी ने सवाल किया कि सिमरन करने में मन नहीं लगता, तो क्या करना चाहिए। बाबाजी ने कहा कि मन को धीरे धीरे काबू में कर सिमरन में ध्यान लगाना चाहिए। जिस प्रकार बहते जल में अपना चेहरा नहीं देख पाते और ठहरे पानी में सब साफ नजर आता है, उसी प्रकार मन को भी स्थिर करने पर सिमरन स्वत: हो जाएगा। एक जिज्ञासु के सवाल पर बाबाजी ने कहा कि जिस प्रकार गंदे बर्तन को साफ कर उसमें सामग्री भरी जाती है, उसी प्रकार मस्तिष्क को भी साफ करना होगा।
बाबाजी ने कहा कि दुनियावी लोगों को देखने का दायरा बेहद सीमित है, इसलिए हम उसी दायरे में सिमटकर जीवन को भोगते हैं। यदि अपने दायरे को विस्तृत करें तो अनेकों सवालों के जवाब स्वयं मिल जाएंगे। परिवार के किसी सदस्य एवं प्रियजन अथवा मित्रगण के खोने पर दुख होने के सवाल पर बाबाजी ने कहा कि परमपिता ने सबको सहनशक्ति प्रदान की है, सृष्टि हमेशा चलती रहती है परमपिता ने ये जीवन हमें कुछ करने कुछ सीखने के लिए प्रदान किया है इसे यूं ही गंवाना नहीं चाहिए। एक युवक ने पूछा कि पापा ने आदेश दिया था कि दुकान पर बैठूं, लेकिन आस्था के वशीभूत मैं यहां आ गया, मुझे क्या करना चाहिए था। बाबा ने कहा कि पिता का आदेश पहले मानो, क्योंकि माता पिता की आज्ञा भी किसी अच्छे कार्य के लिए जरूरी होती है। एक महिला ने पूछा कि पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच सत्संग में आने पर परिवार में विवाद की स्थिति होती है, क्या किया जाए। इस पर बाबा ने कहा कि तालमेल बनाओ, परिवार की जिम्मेदारी भी निभाओ और सत्संग भी जाओ।
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