बिजनौर में छत, पायदान, बंफर, खिड़की... जिसे जहां जगह मिली लटक लिया। त्योहार मनाकर लौटते लोगों की भीड़, विद्यार्थियों को स्कूल जल्द पहुंचने की चिंता, बस में भीतर जगह नहीं रही तो छत और बाहर जहां पैर टिकाने और पकड़ने की जगह मिली लटक गए। कुछ को तो पैर टिकाने तक की जगह नहीं मिली। ऐसा जोखिम भरा सफर, जिसमें हर पल खतरे में जान थी, कौन जाने किस पल हाथ या पैर फिसल जाए।
सर्वाधिक हादसों वाले जनपदों में शुमार बिजनौर में परिवहन सुविधाओं का क्या हाल है ये तस्वीर बता रही है। यह नजरा था सोमवार सुबह साढ़े आठ बजे बिजनौर में नजीबाबाद मार्ग पर सेंट मेरी स्कूल के पास से गुजर रही एक निजी बस का। बस चालक- परिचालक को चंद रुपयों का लालच, सवारियों को समय पर अपने ठिकाने पर पहुंचने की जल्दी थी, बस में अंदर और बाहर पैर रखने तक की जगह नहीं बची थी। हाथ फिसल जाए तो गई जान। किसे दोषी ठहराए, जगह न होने के बाद भी सवार हुए लोगों को या फिर चालक-परिचालक को। त्योहार पर अतिरिक्त बसे उपलब्ध कराने के दावे हवा हो गए। डग्गामारी और क्षमता से अधिक सवारी ढोने के मामलों में कार्रवाई करने वाले विभाग और अधिकारियों ने आंख बंद कर ली। यह फोटो सवाल छोड़ रहा है कि क्या जान दांव पर लगाऐसे ही सफर करने को बेबस रहेगी जिंदगी।
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