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1857 का संग्राम: पूर्ण चंद्र रात्रि में उठा था क्रांति का ज्वार, एक क्लिक में जानें इतिहास

Thu, 10 May 2018 05:18 PM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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1857 की क्रांति
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9 मई 1857 की रात थी। उस रात आसमान में पूरा चांद खिला था। भले ही मेरठ समंदर से हजारों मील दूर हो पर उसी रात यह क्रांति का ऐसा ज्वार उठा जिसने ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिलाकर रख थीं।

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दासता की जंजीरों को तोड़ने के लिए पूरा देश आतुर था, लेकिन इसके लिए न तो समय नियत हो पा रहा था और न ही इसके लिए एकजुटता बन पा रही थी। आखिरकार मेरठ में क्रांति की यह ज्वाला फूटी। दरअसल नौ मई को जो हुआ उसकी सूचना तो पहले ही अंग्रेजी हाकिमों को होने लगी थी पर उन्हें शायद यह इल्म नहीं था कि यह बगावत मामूली चिंगारी नहीं है, एक ऐसा शोला है जो पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को झुलसा देगी। कर्नल कुस्टान्स तथा कर्नल जॉन फिनिश मेरठ के तत्कालीन कमिश्नर एचएच ग्रीथेड के बंगले पर रात्रिभोज का लुत्फ उठा रहे थे। तभी उन्हें यह सूचना मिली कि शहर में लोगों को भड़काने वाले पोस्टर चस्पा किए गए हैं। इसमें अंग्रेजों को काट डालने की भी अपील की गई है, पर अहंकार में डूबे अंग्रेज अफसरों ने इस और ध्यान नहीं दिया। इसे मामूली बात समझा। इस बाबत लेफ्टिनेंट गफ ने अपने अधिकारी कारमाइकेल स्मिथ को पूरी रिपोर्ट दी। कहा कि सेना में बगावत हो रही है। एक टुकड़ी हमला बोलकर कैदियों को मुक्त करा सकती है, पर स्मिथ ने उल्टा उन्हें ही डांट पिला दी। अगले ही दिन यह साबित हो गया कि सूचना निराधार नहीं थी।

200 बेड़ियों में कैद करने की फैली थी अफवाह
नौ मई को ही यह अफवाह पूरे शहर में फैल गई थी कि 200 बेड़िया बनवाई जा रही हैं जिसमें काली पल्टन यानी भारतीय सैनिकों को बंदी बनाया जाएगा। अफवाह यह भी थी कि हड्डियों के चूर्ण से मिश्रित आटा बनवाया जा रहा है जिसे बाजार में बेचा जाएगा। ऐसी ही तमाम अफवाहें नगर में चल रही थीं।
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आखिर फूट पड़ी चिंगारी
दस मई की शाम पांच बजे आखिरकार विद्रोह की चिंगारी फूट पड़ी। भीड़ नंगी तलवारों के साथ सड़कों पर उतार आई। पहले काली पल्टन सेना के जवान, उनके पीछे पीछे भीड़ सेना के परेड ग्राउंड पर पहुंच गए। पहली मस्कटी फायरिंग 20वीं देसी सेना ने शुरू की। सदर बाजार से लेकर परेड ग्राउंड तक विद्रोह शुरू हो चुका था। मारकाट शुरू हो चुकी थी। भीड़ का नेतृत्व छावनी के पुलिसकर्मी कर रहे थे।

यह था तोपची मैकएलरॉय का बयान

1857 की क्रांति
दूसरी अश्वसेना ब्रिगेड की तीसरे सेक्शन के तोपची जेम्स मैकेएलराय ने विद्रोह के शुरू में ही बयान दर्ज कराया था। वह इसके साक्षी थे। इसके मुताबिक ‘दस मई 1857 की सांयकाल जब मैं मेरठ के सदर बाजार में था तो लगभग पांच या छह बजे के बीच मैंने देखा कि कुछ लोग कोतवाली की दौड़े। तीसरे अश्वसेना का एक सवार जिसकी बांहों में दो फीतियां लगी थीं मेरी ओर आया और बोला, जल्दी करो। मैं मुड़ा किन्तु देसी लोगों की भीड़ मुझ पर झपटी। मुझे लाठी और पत्थर मार मारकर गिरा दिया। फिर वे दूसरों की ओर दौड़े। मैं उठा और भागा। अभी मैं पान शॉप के पास पहुंचा ही था कि मेरे मस्तक पर शायद तलवार या कुल्हाड़े से वार किया गया। मैं मूर्छित हो गया। इसके बाद मेरे साथियों ने मुझे अस्पताल पहुंचाया।’

यह जंग धरम के कारण है जो हमारे साथ आना चाहे आ जाए
10 मई को ही सूर्यास्त के समय क्रांति की ज्वाला चरम पर थी। यहां कस्टम हाउस जला दिया गया था। छावनी में बंगलों में आग लगा दी गई थी। 70-80 लोग जवानों के हाथों में बंदूकें थीं और वह अंग्रेजी कैद से लोगों को छुड़ाकर लौट रहे थे। उन्होंने हुंकार भरी। यह जंग धरम के कारण है। देश के कारण है। जिसे आना है वह हमारे साथ आए और विद्रोहियों की संख्या बढ़ती चली गई।

1857 की मुख्य तारीखें   
. 8 अप्रैल मंगल पांडे को फांसी दी गई।
. 9 मई चर्बी युक्त कारतूस चलाने का विरोध करने पर भारतीय सैनिकों का कोर्टमार्शल हुआ।
. 10 मई 85 सैनिकों ने अंग्रेजी हुुकूमत का विरोध किया।
. 11 मई सिपाहियों का दिल्ली में कब्जा।
. 13-31 मई देश के विभिन्न जिलों में विरोध शुरू।
. 01-05 जून मुरादाबाद, बदायूं, आजमगढ़, सीतापुर में विरोध शुरू।
. 06 जून नानासाहेब की फौज द्वारा कानपुर का घेराव।
. 07-8 जून झांसी का किला फतह।
. 09-13 जून फतेहपुर, दरियाबाद और नौगांव में विद्रोह।
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गली-गली गाया जाता था यह गीत

1857 की क्रांति
  क्रांति का कौमी तराना
  हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा
  पाक वतन हैं कौम का जन्नत से भी प्यारा
  ये है हमारी मिल्कियत हिंदुस्तान हमारा
  इसकी रुहानियत से रोशन है जग सारा
  कितना कदीम कितना नईम
  सब दुनिया से न्यारा
  करती है जरखेज जिसे गंगा-जमुना की धारा
  ऊपर बर्फीला पर्वत पहरेदार हमारा
  नीचे साहिल पर बजता सागर का नक्कारा
  इसके खाने उगल रही सोना, हीरा, पारा
  इसके शानो-शौकत का दुनिया में जयकारा
  आया फिरंगी दूर से ऐसा मंतर मारा
  लूटा दोनों हाथों से प्यारा वतन हमारा
  आज शहीदों ने है तुमको अहल-ए-वतन ललकारा
  तोड़ों गुलामी की जंजीरें, बरसाओ अंगारा
  हिंदू-मुस्लिम सिख भाई-भाई प्यारा
  यह है आजादी का झंडा
  इसे सलाम हमारा

(यह गीत क्रांति के पूरे दौर में और उसके बाद भी गुनगुनाया जाता रहा। माना जाता है कि देश को आजादी दिलाने में यह गीत बहुत महत्वपूर्ण रहा। युवाओं में क्रांति अग्नि पैदा करने के लिए यह गीत गली-गली गाया जाता था। अजीमुल्ला खां ने इस गीत की रचना की थी।)

निशाने पर थे अंग्रेजों के बंगले
10 मई को जब हिंसा हुई तो क्रांतिकारियों के निशाने पर अंग्रेजों के बंगले रहे। 03 बंगलों का उल्लेख दस्तावेजों में मिला। सैनिकों को गायें व सुअर की चर्बी से बने कारतूस चलाने का आदेश देने वाला थर्ड कैवेलरी का कमांडिंग ऑफिसर कारमाइकल स्मिथ के वेस्ट एंड रोड स्थित बंगले को निशाना बनाया गया था। हालांकि कारमाइकल स्मिथ पहले ही फरार हो गया था। एक और बंगले में मिसेज चैंबर को क्रांतिकारियों ने मार डाला। अंग्रेजों के एक अधिकारी चॉर्ल्स कॉशन के बंगले को आग लगा दी थी। 

1857 की क्रांति की ज्वाला मेरठ से फूटी थी। सदर चौक में थाने के सामने गदर की शुरुआत हुई, जिसके निशां आज भी वहां कायम हैं। मेरठ का आजादी की लड़ाई में अप्रतिम योगदान है । जिसे इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकता। - डॉ. केडी शर्मा, वरिष्ठ इतिहासकार

शहर में जहां-जहां अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की आवाजें बुलंद हुईं, उन स्थानों पर पत्थर लगाकर उन्हें पहचान दी गई है। मेरठ का आजादी की लड़ाई में यह योगदान हमेशा याद रहेगा। वीरों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया है। - डॉ. अमित पाठक, इतिहासकार

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