क्रांति का कौमी तराना
हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा
पाक वतन हैं कौम का जन्नत से भी प्यारा
ये है हमारी मिल्कियत हिंदुस्तान हमारा
इसकी रुहानियत से रोशन है जग सारा
कितना कदीम कितना नईम
सब दुनिया से न्यारा
करती है जरखेज जिसे गंगा-जमुना की धारा
ऊपर बर्फीला पर्वत पहरेदार हमारा
नीचे साहिल पर बजता सागर का नक्कारा
इसके खाने उगल रही सोना, हीरा, पारा
इसके शानो-शौकत का दुनिया में जयकारा
आया फिरंगी दूर से ऐसा मंतर मारा
लूटा दोनों हाथों से प्यारा वतन हमारा
आज शहीदों ने है तुमको अहल-ए-वतन ललकारा
तोड़ों गुलामी की जंजीरें, बरसाओ अंगारा
हिंदू-मुस्लिम सिख भाई-भाई प्यारा
यह है आजादी का झंडा
इसे सलाम हमारा
(यह गीत क्रांति के पूरे दौर में और उसके बाद भी गुनगुनाया जाता रहा। माना जाता है कि देश को आजादी दिलाने में यह गीत बहुत महत्वपूर्ण रहा। युवाओं में क्रांति अग्नि पैदा करने के लिए यह गीत गली-गली गाया जाता था। अजीमुल्ला खां ने इस गीत की रचना की थी।)
निशाने पर थे अंग्रेजों के बंगले
10 मई को जब हिंसा हुई तो क्रांतिकारियों के निशाने पर अंग्रेजों के बंगले रहे। 03 बंगलों का उल्लेख दस्तावेजों में मिला। सैनिकों को गायें व सुअर की चर्बी से बने कारतूस चलाने का आदेश देने वाला थर्ड कैवेलरी का कमांडिंग ऑफिसर कारमाइकल स्मिथ के वेस्ट एंड रोड स्थित बंगले को निशाना बनाया गया था। हालांकि कारमाइकल स्मिथ पहले ही फरार हो गया था। एक और बंगले में मिसेज चैंबर को क्रांतिकारियों ने मार डाला। अंग्रेजों के एक अधिकारी चॉर्ल्स कॉशन के बंगले को आग लगा दी थी।
1857 की क्रांति की ज्वाला मेरठ से फूटी थी। सदर चौक में थाने के सामने गदर की शुरुआत हुई, जिसके निशां आज भी वहां कायम हैं। मेरठ का आजादी की लड़ाई में अप्रतिम योगदान है । जिसे इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकता। -
डॉ. केडी शर्मा, वरिष्ठ इतिहासकार
शहर में जहां-जहां अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की आवाजें बुलंद हुईं, उन स्थानों पर पत्थर लगाकर उन्हें पहचान दी गई है। मेरठ का आजादी की लड़ाई में यह योगदान हमेशा याद रहेगा। वीरों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया है। -
डॉ. अमित पाठक, इतिहासकार
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