डॉग्स को रिटायरमेंट के बाद मारे जाने के दो तर्क थे। पहला ये कि उन्हें सेना के बेस लोकेशन्स और कैंप की पूरी जानकारी होती है। वे गुप्त जानकारियां भी रखते हैं। ऐसे में यदि आम लोगों को सौंपा जाए तो कहीं वे सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा न बन जाएं। दूसरा तर्क ये था कि इन डॉग्स को किसी एनिमल वेलफेयर सोसाइटी या निजी हाथों में दिया जाता है तो वे उसे सुविधाएं नहीं दे सकते जो सेना में मिलती हैं।
वेटनरी कॉर्प्स का जलवा
मेरठ छावनी स्थित रिमाउंट वेटनरी कॉर्प्स के ट्रेंड डॉग्स को साइलेंट वॉरियर्स कहा जाता है। वजह दुश्मनों को चीर देने की क्षमता रखने वाले ये डॉग्स किसी चीते से कम नहीं हैं। आरवीसी ने अब तक कई मित्र देशों को भी अपने ट्रेंड डॉग दिए हैं। यहां पर पहले जर्मन शेफर्ड, लेब्राडोर जैसी नस्लों को ट्रेंड किया जाता था। अब भारतीय नस्ल के देशी कुत्तों को भी प्रशिक्षित किया जा रहा है। छह से नौ माह की उम्र के डॉग्स को कठोर ट्रेनिंग दी जाती है। इसके बाद ये डॉग्स तीस फीट बर्फ में दबे सेना के जवानों को खोजने और जमीन में कई फीट नीचे बिछे एक्सप्लोसिव का चंद सेकेंड में पता लगा लेते हैं। सीमा पर घुसपैठियों को पकड़ने से लेकर माइन डिटेक्शन में इनकी अहम भूमिका है। रिमाउंट वेटनरी कॉर्प्स में दुनियाभर से अफसर स्पेशल कोर्स करने के लिए आते हैं।
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