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साहित्य से हुआ संगम और भद्र पुरुष बन गए रविंद्रनाथ त्यागी

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नहटौर के मोहल्ला सराय जोखा सिंह में हाथी वाला मंदिर,जिसमें रवीन्द्रनाथ त्यागी के समय लगती थी संघ - फोटो : BIJNOR
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साहित्य से हुआ संगम और भद्र पुरुष बन गए रविंद्रनाथ त्यागी
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बिजनौर। ‘रोज दिन इसी तरह फेंका जाता है बरामदे में अखबार की तरह
जो सिर्फ अपनी ही बात करता है मेरी कोई बात कभी नहीं सुनता।’
अपने काव्य, व्यंग्य और रचनाओं से साहित्य के भद्र पुरुष रविंद्रनाथ त्यागी ने हिंदी साहित्य को अलग पहचान दिलाई है। संस्कृत पढ़ने के बाद हेडमास्टर की कृपा से इंग्लिश पढ़ने वाले त्यागी जी का प्रयागराज में सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा और उनके साहित्य से ऐसे ही संगम हो गया, जैसे गंगा का यमुना और सरस्वती से होता है। दुष्यंत कुमार द्वारा पहली कविता प्रकाशित किए जाने के बाद रविंद्र नाथ त्यागी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने साहित्य में अपनी अमिट छाप छोड़ी है।
रविंद्रनाथ त्यागी का जन्म नहटौर के मोहल्ला सराय जोखा सिंह के रहने वाले कविराज की उपाधि से सम्मानित मुरारीदत्त त्यागी के यहां नौ मई 1930 को हुआ था। उनका बचपन विषम परिस्थितियों में बीता। घर में इतनी तंगी थी कि इलाज के अभाव में उनके कई भाई-बहनों की मौत हो गई थी। उनके पिता खुद चिकित्सक थे, लेकिन परिवारवालों ने उन्हें पैतृक संपत्ति से बेदखल कर दिया था। त्यागी जी की अपने पिता से अनबन रहती थी लेकिन वे उन्हें स्नेह भी बहुत करते थे। अपने पिता के बारे में उन्होंने लिखा है कि पहली बार उन्हें पता चला कि आप एक ही इंसान से प्यार और नफरत दोनों एकसाथ कर सकते हैं। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा मदरसे में ली लेकिन आर्थिक तंगी की वजह से वह छूट गया। उन्हें उनके पिता ने एक वैद्य के यहां छोड़ दिया, जो संस्कृत में निपुण थे। वैद्य से संस्कृत का ज्ञान लिया और बाद में मंदिर में संस्कृत की पाठशाला में पढ़ाई की। किसी तरह संस्कृत की शिक्षा लेकर उन्होंने अंग्रेजी पढ़ने की ठानी। मोहल्ले के एक अंग्रेजी अध्यापक ने उन्हें अपने स्कूल में एडमिशन दिलाकर फीस माफ करा दी। उन्होंने हर कक्षा अच्छे अंकों से पास की। इंटर में उन्होंने प्रांत में सातवां स्थान प्राप्त किया था। इनकी पढ़ाई वजीफे से मिलने वाली राशि से हुई। प्रयाग विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया तो उस समय के महाकवियों के संपर्क में आए और साहित्य के क्षेत्र में प्रवेश किया।
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उनकी पहली कविता दुष्यंत कुमार त्यागी ने प्रकाशित कराई थी। अपने जीवन के कष्टों का लावा वे अपने व्यंगों से निकालने लगे। उन्हें इंडियन डिफेंस अकाउंट्स सर्विस में चुना गया। बाद में देहरादून में बस गए। अपनी रचनाओं के लिए उन्हें बंबई का चकल्लस पुरस्कार, उज्जैन का टेपा पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी का श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पुरस्कार तथा सन 1977 में अट्ठाहस पुरस्कार मिले हैं। उन्होंने व्यंग के साथ काव्य लेखन भी किया और उपन्यास भी लिखे। चार दिसंबर 2004 को उनका निधन हो गया।
प्रमुख रचनाएं
रविंद्रनाथ त्यागी ने काव्य में सूखे और हरे पत्ते, कल्पवृक्ष, आदिम राग, आखिरकार, सलीब से नाव तक, अंतिम वसंत, व्यंग रचना में खुली धूप में नाव पर, भित्तीचित्र, मल्लिनाथ की परंपरा, कृष्णवाहन की कथा, देवदार के पेड़, शोकसभा, मेरी व्यंग्य कथा, फूलों वाले कैक्टस, पदयात्रा, पराजित पीढ़ि के नाम, उपन्यास अपूर्ण कथा, बाल साहित्य में मास्टर भोलाराम का लेखन किया। संपादन का कार्य भी किया।
मिलनसार थे रविद्र नाथ त्यागी
नहटौर के मोहल्ला चौधरियान निवासी एडवोकेट ओमेन्द्र त्यागी बताते हैं कि वह हिन्दी साहित्य के व्यंगकार थे। जब भी वह उनसे मिलते तो व्यंग का एक नया एहसास उनसे मिलता था। देहरादून से जब नहटौर आते थे तो कई लोगों से मिलते थे। नागेंद्र त्यागी बताते हैँ कि सहज स्वभाव से वह गंभीर सवालों तक पहुंच जाते थे। पुष्पेन्द्र शर्मा बताते हैं कि वह एक बार अपने पिता जी के साथ रविंद्र नाथ त्यागी से मिले थे। तब पता चला था कि वह तो पड़ोसी हैं।
नहटौर की यादें
रविंद्र नाथ त्यागी नहटौर में रहने के दौरान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सदस्य थे। अपनी पुस्तक बादलों का गांव में वह नहटौर का जिक्र करते हुए कहते हैं कि ‘मैं नियम पूर्वक शाखा में जाता था। मेरे कस्बे में मुस्लिम ज्यादा थे, पर सांप्रदायिकता की कोई बात नहीं थी। देश के विभाजन के समय मैं 16-17 साल का था। मेरे कस्बे में बहुत से शरणार्थी आए और घुल मिल गए। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को महात्मा गांधी की हत्या का दोषी ठहराया गया। इसकी तुलना हिटलर की नाजी पार्टी से की गई। इसके बाद मेरे कस्बे की संघ की शाखा ने काम बंद कर दिया। मुझे ताज्जुब हुआ, क्योंकि संघ ने कभी शारीरिक व्यायाम के अलावा कुछ नहीं दिखाया। गांधी के खिलाफ भी कुछ नहीं कहा। संघ के कार्यकर्ता भी गांधी जी की हत्या पर दुखी थे।
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भूखे पेट भी सोना पड़ा
रविंद्र नाथ बताते हैं कि इंटरमीडिएट में भयंकर आर्थिक संकट था। कई बार भूखे पेट सोना पड़ा। देहरादून जाने के बाद उन्होंने अपना मकान किराए पर दे दिया था। किराया लेने वह समय-समय पर नहटौर आया करते थे। बाद में उन्होंने यह मकान बेच दिया।

नहटौर के मोहल्ला सराय जोखा सिंह में वह गली जहां रहते थे रवीन्द्रनाथ त्यागी।- फोटो : BIJNOR

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