हस्तिनापुर। भगवान शांतिनाथ पंच कल्याणक प्रतिष्ठा मंगलवार को हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। भगवान के जन्म कल्याणक अवसर पर हजारों श्रद्धालु सुबह से ही पांडाल में उपस्थित हुए। यह पंच कल्याणक पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ के सान्निध्य में संपन्न हो रहा है। उन्होंने कहा कि धर्म से सामान्य प्राणी भी तीर्थंकर बन सकता हैं।
संपूर्ण कार्यक्रम आर्यिका श्री चंदनामति माताजी के मार्गदर्शन एवं पीठाधीश स्वस्तिश्री रवींद्रकीर्ति स्वामी जी के निर्देशन में संपन्न किए जा रहे हैं। महोत्सव में आज भगवान शांतिनाथ का जन्म उत्सव उनके जन्माभिषेक एवं विशाल रथयात्रा जुलूस के साथ मनाया गया। सर्वप्रथम प्रात: काल पंच कल्याणक विधान की पूजा हुई। इसके बाद विधि विधान के साथ प्रतिष्ठाचार्य पं. विजय कुमार जैन, पं. दीपक द्वारा भगवान के जन्म की घोषणा होते ही सारे पांडाल में भगवान शांतिनाथ के जयकारे गूंज उठे। भगवान का जन्म होते ही स्वर्ग में सौधर्म इंद्र का आसन कंपायमान होने का दृश्य देखकर श्रद्धालुओं ने आनंद उठाया। इस अवसर पर भगवान के माता-पिता बने महेंद्र, सुषमा साहू, धनकुबेर सुजीत, मनीषा साहू, सानत कुमार इंद्र, आशीष, अर्चना साहू, महायज्ञ नायक विनोद, रेखा साहू, माहेंद्र इंद्र विलास, करुणा साहू आदि ने श्रद्धालुओं को आकर्षित किया। सौधर्म इंद्र ने अपनी शचि इंद्राणी को गर्भगृह में भेजकर माता से तीर्थंकर शिशु बालक को मंगवाया। इसी के साथ ऐरावत हाथी पर तीर्थंकर शिशु को बैठाकर विशाल रथयात्रा नगर में निकाली गई।
प्रमुख इंद्र, इंद्राणियों ने लिया भाग
रथयात्रा जुलूस में प्रमुख इंद्र, इंद्राणियों ने भाग लिया। पूज्य माताजी ससंघ जुलूस में शामिल हुईं और महिलाएं, बच्चे, बच्चियां, युवक-युवती और पुरुषों ने केसरिया एवं सफेद वस्त्रों के साथ नृत्य किए। तीर्थ पर जुलूस पहुंचने के बाद जन्म अभिषेक का भव्य समारोह संपन्न हुआ। इसमें भगवान के माता-पिता, धनकुबेर, ईशान इंद्र, सानत कुमार इंद्र आदि सैकड़ों इंद्र, इंद्राणियों की टोलियों ने पुण्य अर्जित किया। जन्माभिषेक में जल के साथ दूध, सर्वोषधि, पुष्प, केशर आदि पंचामृत सामग्री का भी उपयोग किया। प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार जैन, पं. दीपक उपाध्ये द्वारा भगवान की आकार शुद्धि की विधि संपन्न कराई। मूर्तियों को मंत्रोच्चारपूर्वक पवित्र किया गया। रात्रि में भगवान के जन्म पर उनके पालने झुलाने का कार्यक्रम रखा गया। हजारों श्रद्धालुओं ने भगवान के पालना झुलाने का पुण्य अर्जित किया। बालक्रीड़ा का भी आयोजन किया गया। जिसमें तीर्थंकर बालक के साथ अन्य बालकों ने विभिन्न खेल खेला। रात्रि में विशेष रूप से भगवान की आरती के पश्चात गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की मंगल आरती हुई।
प्रभु का जन्म होते ही वातावरण हो जाता है सुंदर
गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने कहा कि प्रभु का जन्म होते ही नैसर्गिक वातावरण रमणीय और सुंदर हो जाता है। उस समय समस्त दिशाएं स्वच्छ हो जाती हैं। आकाश भी निर्मल हो जाता है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानों भगवान के गुणों की निर्मलता का वे अनुकरण कर रहे हो। इसलिए आवश्यकता है कि प्रत्येक भक्त को पंच कल्याणकों में निहित भावना को भी अच्छी तरह जाना जाए। उद्धवलोक में इंद्र का सिंहासन कंपायमान होता है। समस्त देवता अनेकानेक रूपों में हर्ष का प्रदर्शन करते हैं। गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान एवं निर्वाण ऐसे पांच समय हैं जिनका सीधा संपर्क संपूर्ण सृष्टि से है। गर्भ के छह माह पूर्व रत्नों की वृष्टि आने वाले जीव द्वारा कल्याण की पूर्व सूचना की ही प्रतिपादक है। तप, ज्ञान और मोक्ष, प्राणी मात्र को सहज ही मनुष्य जन्म का लक्ष्य इंगित करते हैं। जब भी पाषाण को भगवान बनाना है, मानव को महामानव बनाना है, तो ये पंचकल्याणकों में निहित ज्ञान ही प्रेरक, उत्प्रेरक एवं संप्रेरक बनते हैं। साथ ही संदेश देते हैं कि सामान्य प्राणी भी तीर्थंकर बन सकता है। इस दिशा में प्रयत्नशील हो सकता है तथा स्वकल्याण के साथ विश्व का भी कल्याण कर सकता हैं। पंचकल्याणकों के माध्यम से ही जहां विशेष प्रभावना होती है, वही प्रत्येक श्रद्धालु के उत्कर्ष का मार्ग खुलता है।