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सुनहरे सपनों की ‘साक्षी’

Sat, 20 Aug 2016 02:08 AM IST
अमर उजाला ब्यूरों
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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 रियो ओलंपिक में साक्षी मलिक के कांस्य पदक जीतने के बाद मेरठ की महिला पहलवानों में भी जोश भर गया है। अब वह नयी ऊर्जा के साथ तैयारी में जुट गई हैं। उनका लक्ष्य भी आगामी ओलंपिक में देश के लिए पदक जीतना है। इसके लिए वह चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के रुस्तम-ए-जमा चौधरी दारा सिंह कुश्ती स्टेडियम में कड़ी मेहनत कर रही हैं। साधारण परिवार की इन रेसलरों की आंखों में सुनहरे सपने हैं, जिन्हें वे किसी भी कीमत पर पूरा करना चाहती हैं।
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कुश्ती ताकत और तकनीक का खेल
अंतरराष्ट्रीय पहलवान प्रियंका सिंह मुजफ्फरनगर के गांव रौनी की रहने वाली हैं। पिता और भाई को खो चुकीं प्रियंका का सपना ओलंपिक में पदक जीतने का है। वह एशिया गेम्स में गोल्ड मेडल व जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीत चुकी हैं। उनका कहना है कुश्ती पावर के साथ तकनीक का गेम है। साक्षी मलिक ने कांस्य पदक जीतकर उनके जैसी तमाम पहलवानों का हौसला बढ़ाया है। उनका जीवन भी कुश्ती का समर्पित है।  

पहले कॉमनवेल्थ, फिर ओलंपिक
गांव मऊ खास निवासी इंदु तोमर ने छोटी उम्र में ही अपनी धाक जमा दी है। वह 55 किलोग्राम भार वर्ग में अंतरराष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी बन चुकी हैं। गरीब किसान परिवार की खिलाड़ी का लक्ष्य पहले कॉमनवेल्थ, उसके बाद ओलंपिक है। वह अलका तोमर और साक्षी मलिक की तरह देश का नाम रोशन करना चाहती हैं। तीन बहनों और दो भाई में सबसे छोटी इंदु पदक के लिए जमकर पसीना बहाती है। इंदु का कहना है कि वो अपने परिवार के भरोसे को नहीं तोड़ेगी।
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परिवार का है पूरा सपोर्ट
मऊ खास निवासी दिव्या तोमर 44 किलोग्राम भार वर्ग में नेशनल स्तर पर पदक जीत चुकी हैं। 12वीं कक्षा की छात्रा दिव्या कड़ी मेहनत में विश्वास करती हैं। वह किस्मत के भरोसे नहीं रहती हैं। उनका मानना है कि पहले मेहनत करेंगे, रिजल्ट समय पर छोड़ देना ही बेहतर है। दिव्या का चयन फ्रांस में होने वाली कुश्ती प्रतियोगिता के लिए हो गया है। उनका सपना भी ओलंपिक में पदक लाना है। 3 भाइयों की इकलौती बहन दिव्या कहती हैं कि उसे पहलवान बनाने में उनका परिवार पूरा साथ दे रहा है। उसकी हर जरूरत को परिवार पूरा करता है।

सुबह चार बजे से मेहनत शुरू
मऊ खास निवासी दीक्षा 48 किलो भार वर्ग में खेलती हैं। वह सुबह चार बजे से अभ्यास शुरू कर देती हैं। पहले पांच से छह किमी. दौड़ती हैं, उसके बाद अभ्यास करती हैं। दीक्षा ने नेशनल में तीन मेडल जीते हैं। उनका कहना है कि वह दो भाइयों की इकलौती बहन है। भाई उसका पूरा सहयोग करते हैं। परिवार के सपोर्ट से ही वे अब तक इस खेल में है। खिलाड़ी का कहना है कि साक्षी मलिक ने ओलंपिक में पदक जीतकर हमारा हौसला और बढ़ा दिया है। अब लड़कियां जी जान से खेलेंगी।

‘माता-पिता का सपना करूंगी साकार’
पचगांव निवासी इशिका तोमर साधारण परिवार से ताल्लुक रखती हैं। 4 बहन व एक भाई वाले परिवार की इशिका नेशनल चैंपियनशिप में ब्रांज मेडल जीत चुकी हैं। खिलाड़ी का कहना है कि उनके पिता प्राइवेट नौकरी करते हैं। माता-पिता का सपना उसे बड़े खिलाड़ी के रूप में देखने का है। इशिका का कहना है कि साक्षी और अलका तोमर जैसी खिलाड़ियों की वजह से ही हमारा उत्साह बढ़ता है। हर खिलाड़ी का सपना ओलंपिक में पदक जीतने का होता है, वह उसके लिए अपनी पूरी जान लगा देता है। बकौल इशिका मैं भी जान लड़ा दूंगी।


‘उत्साह के साथ सपोर्ट जरूरी’
गांव माछरा निवासी पिंकी का कहना है कि कोई भी काम बगैर सपोर्ट के करना मुश्किल है। परिवार का सहयोग बहुत जरूरी है। इंटर यूनिवर्सिटी नेशनल गेम में कांस्य पदक जीतने वाली पिंकी भी अलका तोमर की तरह देश का नाम रोशन करना चाहती हैं। उनका कहना है कि साक्षी ने तो पूरी दुनिया में देश का सम्मान बढ़ाया है। वह भी अगले ओलंपिक की तैयारी कर रही है। पिता प्राइवेट नौकरी करते हुए भी उसे पूरा सपोर्ट करते हैं। उसके मांगने से पहले ही हर चीज ले आते हैं।
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