नगर निगम में अपनी ही एक घोटाले की ‘सरकार’ चल रही है। जिस टेंडर के लिए राज्य सरकार की अनुमति लेनी अनिवार्य है, उसका ठेका निगम स्तर से ही छोड़ दिया गया। राज्य सरकार को भनक तक नहीं लगने दी। 50 करोड़ के इस ठेके से घोटाले की दुर्गंध उठ रही है।
नगर निगम में 2215 संविदा सफाईकर्मी थे। पिछले साल संविदा सफाई कर्मी वेतन वृद्धि की मांग को लेकर आंदोलन पर चले गए थे। नगर विकास मंत्री आजम खां ने सफाई कर्मियों की संविदा को अवैध करार देते हुए ठेका प्रथा लागू करने के आदेश जारी कर दिए। तत्कालीन नगरायुक्त ने ठेके पर सफाई कराने के लिए टेंडर को स्वीकृति दे दी। टेंडर 30 दिन में पूरा करना था। लेकिन तत्कालीन नगर स्वास्थ्य अधिकारी ने तमाम आपत्तियों को दरकिनार करते हुए मात्र पांच दिन में ही टेंडर की सारी प्रक्रिया पूरी कर ली।
एक नहीं, दो साल का ठेका
सरकारी विभागों में कोई भी ठेका एक साल यानी वित्तीय वर्ष के लिए ही छोड़े जाने का प्रावधान है। लेकिन निगम अधिकारियों ने अलकनंदा कंपनी के नाम सफाई का ठेका 50 करोड़ रुपये में दो साल के लिए छोड़ दिया।
ऑडिटर होता तो पकड़ा जाता खेल
नगर निगम में शासन ने ऑडिटर की तैनाती की हुई है। लेकिन मुख्य नगर लेखा परीक्षक (ऑडिटर) और नगरायुक्त में ठनी हुई थी। तत्कालीन नगरायुक्त की शिकायत पर शासन ने ऑडिटर को हटा दिया था। माना जा रहा है कि यदि ईमानदार ऑडिटर होता, तो इस गड़बड़ को पकड़ लेता। क्योंकि टेंडर को खोलने से लेकर शर्तों तक में घालमेल किया गया।
ये है नियम
निगम एक्ट 133- दो के अनुसार, अनुबंध करने की शक्ति केवल नगरायुक्त के अधीन होती है। जिसमें एक पार्षद गवाह के रूप में उपस्थित होता है। यही अनुबंध मान्य होता है।
यहां तोड़े गए नियम और कानून
- अलकनंदा कंपनी को दिए गए सफाई के ठेके का नगरायुक्त द्वारा अनुबंध नहीं किया गया। एक्ट के विरुद्ध नगर स्वास्थ्य अधिकारी ने ही अनुबंध कर लिया।
- नियमानुसार नगरायुक्त के पास 10 लाख रुपये, महापौर को 15 लाख रुपये, कार्यकारिणी को 20 लाख रुपये और बोर्ड को 30 लाख रुपये तक के कार्य स्वीकृत करने का अधिकार है। इससे ज्यादा के कार्य के लिए शासन से स्वीकृति लेनी पड़ती है।
कंपनी ने भी किया खेल
टेंडर में तय किया गया था कि प्रत्येक मजदूर को मानदेय 7500 रुपये प्रतिमाह मिलेगा। साथ ही भत्ते भी दिए जाएंगे। ईपीएफ और ईएसआई की सुविधा मिलेगी। एक जैकेट और आईकार्ड दिया जाएगा। लेकिन सफाई मजदूरों के पास न तो जैकेट है और न आईकार्ड। और तो और अलकनंदा कंपनी समय पर वेतन तक नहीं दे रही है। मंगलवार को ही आउट सोर्सिंग वाले 2215 कर्मचारियों का वेतन देरी से दिया गया। कुल मिलाकर दो करोड़ रुपये का एक माह का वेतन बना। उधर, सफाई के टेंडर में हुई गड़बड़ी में भले ही नगर स्वास्थ्य अधिकारी की कुर्सी चली गई, लेकिन न तो टेंडर प्रक्रिया में सुधार आया और न ही शर्तों का उल्लंघन करके कार्य करने वाली कंपनियों का पेमेंट रोका जा रहा है।