‘तुमने दस-दस लाख दिए हैं, वीरों की विधवाओं को
यानी कीमत लौटा दी है, वीर प्रसूता माओं को
लो मैं बीस लाख देता हूं, तुम किस्मत के हेठों को
हिम्मत है तो मंत्री, लड़ने भेजें अपने बेटों को’
ओज के कवि विनीत चौहान की ये पंक्तियां उस आक्रोश को हूबहू प्रतिबिंबित कर गईं जो शहीद अजय की अंतिम यात्रा के दौरान लोगों के चेहरों पर नमूदार हो रहा था। यहां जन प्रतिनिधियों का जमकर विरोध हुआ और लोगों ने खुलकर कहा कि राजनीति के कारण ही जवानों को शहादत का जाम पीना पड़ रहा है। नेता अपने बेटों को लड़ने के लिए सीमा पर भेजें तो पता चले कि शहादत क्या होती है?
जैसे-जैसे शहीद अजय के पार्थिव शरीर को बसा टीकरी पहुंचने में देर हो रही थी, वैसे-वैसे ही लोगों के दिलों में छिपा दर्द का गुबार, आक्रोश के रूप में फूटता चला गया। अचानक ही जन प्रतिनिधियों का विरोध शुरू हो गया। सभी दलों के नेताओं को कोसा जाने लगा।
चूंकि जिम्मेदारी सत्ताधारी पार्टी की है इसलिए उन्हीं पर सबसे ज्यादा गुबार फूटा। पहले बुजुर्गों ने कहना शुरू किया कि यह सब नेताओं के कारण हो रहा है। यह देखा ही नहीं जा रहा कि वास्तव में इस समस्या का हल क्या है। दूसरी तरफ युवाओं ने भी मोर्चा खोल दिया। उन्हाेंने कहा कि सेना को खुली छूट नहीं दे रहे हैं। पत्थरबाज नासूर बन गए हैं।
उन्होंने घर परिवार से लेकर सरहद तक की बात की। उन्होंने आवाज उठाई कि 20-25 लाख रुपये से कुछ नहीं होता। जो शेर चला गया उसकी भरपाई कौन करेगा। क्या आज तक किसी नेता ने अपने बेटे को सरहद पर भेजा है। विरोध हुआ कि फोन करने के बाद भी जनप्रतिनिधि कल गांव में नहीं आए।
शहादत का रखें मान
कई बार किसानों के विरोध हुए हैं। लेकिन शहादत पराकाष्ठा को छू गई। इसका परिणाम विरोध के रूप में सामने आया। लोगों ने कहा कि जो काम न करे, उसे वोट मांगने का कोई अधिकार नहीं। जो देश को सुरक्षित रख रहे हैं, उनके परिवारों को भी सुरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठें। यह तो भला हो कि पुलिस ने मुस्तैदी दिखाई और लोगों को समझाया कि यह विरोध का समय नहीं है। अजय की शहादत का मान रखें। तब जाकर लोग शांत हुए।
इनको नहीं दर्शन का अधिकार
विरोध इतना बढ़ गया कि एक बार तो लोगों ने कह दिया कि ये जो सफेदपोश बने बैठे हैं, इन्हें कोई अधिकार नहीं कि शहीद के दर्शन करें। जब अजय का पार्थिव शरीर लेकर सेना के जवान सीधे घर में प्रवेश कर गए तो वहां भी नेताओं को घुसने नहीं दिया गया। अंत्येष्टि स्थल तक यह विरोध होता ही रहा। दरअसल लोगों का यह गुस्सा यकायक ही सामने नहीं आया है।