नोटबंदी के बाद मंडी में ग्राहकों का टोटा है। बाहरी व्यापारी नहीं आ रहे, लिहाजा बिक्री आधी रह गई है। हालत ये हो गई है कि बोली से बिकने वाली सब्जी किसानों को खुशामद से बेचनी पड़ रही है। आढ़तियों की मोटी उधारी मार्केट में फंसी है। ऐसे में वह भी किसान को उसकी सब्जी के भुगतान को 8-10 दिन का वक्त दे रहे हैं। किसानों को इससे दोतरफा मार झेलनी पड़ रही है। अमर उजाला ने नवीन सब्जी मंडी का दौरा कर वहां का हाल जाना।
मंडी में घुसते ही सड़क के दोनों ओर सब्जी की फड़ लगी मिलीं। लेकिन ग्राहक कम थे। आढ़तियों के पास माल था। लेकिन लेकिन बोली नहीं लग रही थी। घाट गांव का किसान रामपाल गाड़ी में धनिया भरकर आढ़त पर लाया था। माल उतारने से पहले एक पल्लेदार से भाव पूछा। पल्लेदार बोला सुबह 250 रुपये कुंतल बिका था। भाव मंदा लगा तो दो तीन आढ़त पर जाकर पता किया। लेकिन इससे ऊपर किसी ने नहीं बताया। एक आढ़ती ने यहां तक कह दिया कि मंडी में इतना मंदा है कि इस भाव में भी बिक जाए ये जरूरी नहीं। मजबूरन किसान मायूस मन से अपने ही आढ़ती के यहां माल उतारकर चला गया।
मिनी ट्रक में गोभी भरकर लाए जाहिदपुर के इमरान को आढ़ती ने 400 रुपये कुंतल का भाव बताया। उसे कम लगा। आढ़ती बोला, पूरी मंडी में पता कर लो, आज सुबह 300 रुपये कुंतल भी बिका है। 400 का भाव भी साफ माल का है। पेमेंट भी 8 दिन बाद मिलेगा। किसान बोला भाई भाड़ा लगाकर माल लाया हूं, बेचना तो पडे़गा ही।
खुले के चक्कर में लगा फटका
गढ़ी गांव के राजपाल सिंह की दोपहर एक बजे भी एक कुंतल गोभी बच गई। कोई लेने वाला नहीं मिला। इरफान नाम के एक ठेली वाले ने 230 रुपये में सौदा तय किया तो दो हजार का नोट दिया। बात खुले रुपयों पर अटक गई। बाद में उसी ग्राहक ने 200 रुपये खुले दिए और किसान को 200 में ही उसे बेचनी पड़ी।
नोटबंदी से मुसीबत
बेहटा आदिपुर निवासी किसान कपिल के अनुसार पिछले साल उनका 15 बीघा धनिया 8-10 रुपये किलो तक बिका था। इसलिए इस बार 25 बीघा में बो दिया। लेकिन नोटबंदी के बाद मंडी में बाहर का व्यापारी नहीं आ रहा। माल का उठान कम है और दो रुपये किलो बेचना पड़ रहा है। मंडी लाने का भाड़ा भी पूरा करना मुश्किल है।
खुशामद कर रहे
निहाड़ा गांव के राजाराम कहते हैं कि पहले उम्मीद से अच्छा भाव मिलता था। लेकिन नोटबंदी के बाद तो बाहर का व्यापारी ही मंडी में नहीं आ रहा। ग्राहकी घटने से खुशामद करके माल निकालना पड़ रहा है। 20 बीघा में गोभी लगाई थी। लेकिन तीन रुपये किलो में बेचनी पड़ रही है।
कमर ही तोड़ दी
पोहल्ली के किसान धीर सिंह कहते हैं कि इस नोटबंदी ने तो उनकी कमर ही तोड़ दी। धनिया तीन रुपये बेचना पड़ा। भाड़ा भी पूरा नहीं हुआ। उल्टा माल उधारी में गया सो अलग। जिसे देखो वो कैश लस की बात करता है। किसान इतना पढ़ा लिखा नहीं है। वो ये सब नहीं जानता।
अब वो बोली कहां
सब्जी आढ़ती शरद अग्रवाल कहते हैं कि एक समय किसान की सब्जी खरीदने को कई व्यापारी आते थे। बोली लगती थी। किसान को उम्मीद से ऊंचा भाव मिलता था। अब तो खुशामद से सब्जी बेचनी पड़ रही है। किसान और छोटे सब्जी वालों को पेटीएम आदि की जानकारी नहीं। वे कैश लेस सिस्टम से काम करने को तैयार नहीं हैं।
उठान कम, काम घटा
नवीन मंडी व्यापार संघ के महामंत्री शरफराज अंसारी कहते हैं कि लोेगों को बैंक से पैसे नहीं मिल रहे। जो धड़ी भर सामान लेते थे, वह एक किलो ले रहे हैं। इसी वजह से रिटेलर माल कम ले रहे हैं। सब्जी का उठान कम है। भाव गिरे हैं। नोटबंदी के बाद आढ़तियों का काफी पैसा मार्केट में फंस गया है। उन्होंने भी काम घटा दिया है।