लापरवाही कहें या फिर सरकारी सिस्टम की हकीकत कि मेरठ मेडिकल कॉलेज की इमरजेंसी में भर्ती महिला मरीज की शौचालय में डिलीवरी हुई। जी हां, यह ऐसा पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी यहां ऐसे मामले हुए हैं जब गर्भवती महिलाएं मेडिकल परिसर में रिक्शा या स्ट्रेचर पर डिलीवरी के लिए मजबूर हुई हों।
आपातकाल विभाग में बुधवार को एक महिला की शौचालय में डिलीवरी करानी पड़ी। इससे वहां मौजूद मरीज के तीमारदार समेत अन्य लोगों का हुजूम लग गया। आनन-फानन में महिला और नवजात को स्टाफ ने उपचार दिया। नवजात प्री मैच्योर (सात माह) है, उसकी सेहत ठीक नहीं है। इसलिए उसे वेंटिलेटर पर रखा है। उसका वजन महज 1.4 किलोग्राम बताया है।
महिला गजाला करीब सात माह की गर्भवती थी। वह गायनिक वार्ड में भर्ती थी। उसे पेट दर्द की शिकायत थी। चिकित्सकों ने उसे सामान्य पेट दर्द बताया। लिहाजा उसे इमरजेंसी में भेज दिया। वहां उसे तेज दर्द हुआ तो शौचालय चली गई। वहां उसने बेटे को जन्म दिया। वह बेहद कमजोर है। इसलिए उसे वेंटिलेटर पर रखना पड़ा है।
इस बाबत मेडिकल स्टाफ की लापरवाही बताई जा रही है। हालांकि मेडिकल कॉलेज के सीएमएस डॉ. अजीत चौधरी का कहना है कि इसमें लापरवाही नहीं है। महिला सात माह की गर्भवती थी और गायनिक के अनुसार उसमें डिलिवरी जैसे लक्षण भी नहीं थे। उसे दर्द भी डिलीवरी वाला प्रतीत नहीं हो रहा था। इलाज में कोई लापरवाही नहीं की गई है। दूसरी तरफ, महिला के परिजनों ने इस संबंध में लिखित शिकायत नहीं की है।
गौरतलब है कि मेडिकल कॉलेज में पहले भी ई-रिक्शा और स्ट्रेचर पर डिलीवरी हो चुकी हैं। पिछले एक साल में इस तरह के दो केस सामने आ चुके हैं। ये घटनांए दर्शाती हैं कि महिलाओं व नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य को लेकर कॉलेज प्रशासन कितना लापरवाह है।
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