शामली। देश की सेवा, आपसी भाईचारे और शिक्षा के लिए पहचान बना चुका सोंता रसूलपुर गांव इन दिनों चर्चा में है। वजह, इसी गांव के दो युवकों, एक-एक लाख के इनामी इमरान और महताब को पुलिस ने अलग-अलग मुठभेड़ों में ढेर कर दिया। दोनों की मौत के बाद गांव में सन्नाटा पसर गया है। लोग कह रहे हैं हमारे गांव के लोग बदमाश नहीं बनते, बदमाशों को सबक सिखाते हैं। आखिर किसकी नजर लग गई हमारे गांव को?
शामली शहर से करीब 14 किलोमीटर दूर बसे इस गांव की आबादी लगभग 22 हजार है। मुस्लिम बाहुल्य इस गांव में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग वर्षों से मिलजुलकर रहते आए हैं। यहीं के यूनुस सेना में सूबेदार रह चुके हैं, अब्दुल रहमान सीआरपीएफ में तैनात हैं, कैफ आईटीबीपी में, दिलशाद सेना में सिपाही हैं, जबकि इश्तकार और अखलाक दिल्ली पुलिस में तैनात हैं। गांव के करीब 110 से अधिक युवा पुलिस और फोर्स में नौकरी कर देश की सेवा कर रहे हैं। यही कारण है कि जब दो युवकों के एनकाउंटर की खबर आई, तो पूरा गांव हतप्रभ रह गया।
तालीम और सौहार्द की मिसाल
सोंता रसूलपुर सिर्फ धार्मिक रूप से नहीं, बल्कि शिक्षा और एकता के लिए भी जाना जाता है। यहां नौ मस्जिदें, चार मदरसे, एक आईटीआई कॉलेज, दो मंदिर और चार सरकारी स्कूल हैं।
मदरसा अरबिया मदीना तुल उलूम में देवबंद से शिक्षा ग्रहण करने वाले मौलाना मोहम्मद यामीन कासमी की देखरेख में 500 से अधिक बच्चे दीनी के साथ दुनियावी तालीम प्राप्त कर रहे हैं। गांव में समय-समय पर जलसे से लेकर मंदिर में सत्संग में दोनों संप्रदाय के लोग भाग लेते हैं।
मदद में भी सबसे आगे
पूर्व जिला पंचायत सदस्य मा. जाहिद और मौलाना यामीन कासमी बताते हैं कि गांव के लोग हमेशा मदद के लिए तैयार रहते हैं। हाल ही में पंजाब के बाढ़ पीड़ितों को गांव की ओर से 12 लाख रुपये की सहायता भेजी गई थी। इससे पहले किसानों के आंदोलन के दौरान भी गांव के युवाओं ने दिल्ली बॉर्डर पर सेवा की थी।
गांव नाम के पीछे की कहानी
गांव के मौलाना यामीन व मा. जाहिद बताते हैं कि यहां पहले सोंता नाम का एक पुराना कुआं हुआ करता था, जिससे लोग पानी भरते थे। उसी कुएं के नाम पर गांव का नाम सोंता रसूलपुर पड़ा।
गांव की छवि पर लगा दाग, इंसाफ की मांग
पूर्व प्रधान भुट्टू कहते हैं, कि हमारे गांव के लोग बदमाश नहीं, बदमाशों के खिलाफ लड़ने वाले हैं।
पूर्व जिला पंचायत सदस्य मा. जाहिद बोले, गांव हमेशा हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल रहा है। इन दो एनकाउंटरों ने हमें तोड़कर रख दिया है, लेकिन हम सच सामने आने तक आवाज उठाएंगे।
कंवरपाल का कहना है कि गांव में हर साल दोनों समुदाय मिलकर धार्मिक आयोजन करते हैं। वहीं भूरा ने कहा कि ऐसा लगता है जैसे गांव को किसी की नजर लग गई हो।
परिजनों की पीड़ा-भाई निर्दोष था
मुठभेड़ में मारे गए इमरान के भाई मोहसिन का कहना है कि इमरान एक फैक्टरी में नौकरी करता था। उसका किसी अपराध से कोई संबंध नहीं था। पुलिस ने निर्दोष को मार डाला, हम जल्द ही डीआईजी और आईजी से मिलकर इंसाफ की मांग करेंगे।
बदमाशों से लड़ते हैं, बदमाश नहीं बनते
सोंता रसूलपुर गांव के लोग आज भी इस बात पर गर्व करते हैं कि उनके बच्चे देश की सीमाओं और कानून व्यवस्था की रक्षा कर रहे हैं।
दो एनकाउंटर और उठे सवाल
दो अक्तूबर को गांव के महताब को मुजफ्फरनगर के बुढ़ाना क्षेत्र में, जबकि पांच अक्तूबर को इमरान को सहारनपुर के सरसावा में पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया गया।
गांव के रामबीर, मनोज, बलबीर और इमरान कहते हैं कि दोनों मेहनत-मजदूरी करते थे। अपराध से कोई लेना-देना नहीं था। पुलिस ने बिना जांच किए गोली चला दी। हमें सच्चाई चाहिए।