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उपचुनावों ने दिखा दिया सियासी मुस्तकबिल

Wed, 17 Feb 2016 02:27 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला मेरठ
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पश्चिम की दो सीटों के उपचुनाव के नतीजे आगामी विधानसभा चुनाव के हिसाब से मायने रखते हैं। कयासों और दावों के बीच सत्ताधारी पार्टी को बड़ा झटका लगा है। लेकिन कांग्रेस कहीं न कहीं इसका लाभ उठाने में कामयाब रही।
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जिसने भविष्य में भी उम्मीदें जगा दीं। भाजपा को बड़ी राहत जहां अपना वोट बैंक सुरक्षित रखने की मिली तो जाटों की घर वापसी के रालोद के दावे हवा हो गए। चुनावी दौड़ से बाहर रही बसपा के लिए दलित-मुस्लिम समीकरण किसी बड़ी

कामयाबी की बुनियाद बन सकता है।
पिछले विधानसभा चुनावों में पश्चिम में हर जिले में सपा ने बेहतर प्रदर्शन किया था। इसकी वजह मुस्लिमों का एकमुश्त वोट मिलना रहा था। लोकसभा चुनावों के बाद उपचुनावों में सपा की सफलता से लगा था कि शायद स्थिति पिछली बार की तरह ही रहे।
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अब चुनाव से ऐन पहले हुए उपचुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने भी कई संदेश दिए हैं।
सहारनपुर की देवबंद और मुजफ्फरनगर सदर दोनों सीटों पर कांग्रेस ने मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव में उतारे। हालांकि दोनों ही

सीटों पर मुस्लिम वर्ग ने अलग-अलग रुख अपनाया। देवबंद सीट पर इमरान मसूद के कांग्रेस प्रत्याशी के साथ मजबूती से होने के कारण मुस्लिमों की पहली पसंद कांग्रेस प्रत्याशी रहा। खास बात यह भी रही कि मुस्लिम इलाकों में मतदान प्रतिशत भी खासा अच्छा रहा।

इसके विपरीत मुजफ्फरनगर सदर में मुस्लिम प्रत्याशी की स्थिति कमजोर देख मुस्लिमों का वोट सपा की ओर गया तो सही लेकिन उत्साह ज्यादा नहीं रहा। इसी कारण यहां पर मुस्लिम क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत भी कम रहा।

पश्चिम में मेरठ के अलावा, बुलंदशहर, गाजियाबाद, बिजनौर, सहारनपुर, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत सहित आसपास के जिलों में मुस्लिम आबादी अच्छी खासी है। ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनावों में मुस्लिम वोट बैंक की नजर दोनों समीकरणों पर रहेगी।

मुस्लिम वर्ग और भाजपा को जिताने की ताकत जैसे फैक्टर पर यह वोट बैंक समर्थन कर सकता है। ऐसे में इन सभी सीटों पर परंपरागत दलित वोट बैंक की संख्या अच्छी होने के कारण बसपा को लाभ मिल सकता है। सपा का परंपरागत यादव वोट बैंक सीमित ही है।

वहीं, भाजपा के लिए खुशी की बात यह है कि वैश्य और ब्राह्मण वोट बैंक के साथ जाट वोटर भी भाजपा के साथ ही दिखाई दिया। मुजफ्फरनगर में सपा और भाजपा दोनों के वैश्य प्रत्याशी होने पर पूरा वर्ग भाजपा के साथ प्रमुखता से साथ रहा।

वहीं, जाट वोटरों के रुख से लगता है कि मुजफ्फरनगर दंगे के बाद बना समीकरण अभी भी मजबूती से काम कर रहा है। सपा के लिए ये उपचुनाव इसलिए भी झटका हैं कि सहानुभूति वोट के कारण इसे आसान माना जा रहा था। रालोद ने मुजफ्फरनगर में पूरा जोर लगाया था।

ऐसा माना जा रहा था कि जाट वोट बैंक इस बार रालोद के खाते में जाकर उसके प्रत्याशी को मजबूती देगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इसलिए भविष्य में जाट वोटरों का रुख भाजपा और रालोद दोनों की रणनीति को प्रभावित करेगा।

बसपा के चुनाव में न होने के कारण दलितों में ज्यादा उत्साह दिखाई नहीं दिया। बसपा का होने पर दलित वोटर प्रभावी भूमिका निभाएगा।

ऐसे में बसपा ने ज्यादा मुस्लिम प्रत्याशी उतारे तो दूसरे सभी दलों के लिए कड़ी चुनौती साबित होगी। चुनाव में लगभग एक साल का समय है। कांग्रेस के खाते में सीट आने से कांग्रेस सीट बंटवारे में इसका इस्तेमाल कर सकती है।

हाथी की गैरमौजूदगी ने खिलाया कमल
उपचुनाव में बसपा के चुनाव नहीं लड़ने का सीधा फायदा बीजेपी को हुआ। शहर का दलित वोट भी सांप्रदायिक आधार पर बीजेपी के पक्ष में बह गया। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 31529 मत हासिल किए थे।

शहर सीट पर सपा को उसकी आशा के अनुरूप ही वोट मिले। बसपा के चुनाव मैदान में नहोने का सीधा लाभ बीजेपी को मिला। शहर सीट पर 25 हजार दलित मतदाता है। 2012 में बसपा से अरविंद राज शर्मा प्रत्याशी थे। दलित मतों के साथ कुछ ब्राह्मण भी उन्हें मिल गए थे।

इससे बीजेपी खिसक कर 44167 मतों पर आ गई थी। बसपा के चुनाव में नहीं होने से बीजेपी इस चुनाव में 65378 मतों पर चली गई। शहर का दलित भी सांप्रदायिक आधार पर बीजेपी के पक्ष में चला गया।

यदि बसपा चुनाव लड़ती को बीजेपी के लिए सीट निकालना मुश्किल हो सकता था। बीजेपी नेता भी मानते हैं कि दलितों ने उसके पक्ष में मतदान किया है।

जाटों की पसंद कौन? अजित या संजीव
संसदीय चुनाव से शुरू हुए भाजपा के विजय रथ को कोई सियासी पार्टी रोक नहीं पाई है। जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर फतह के बाद अब उपचुनाव में भी भाजपा का डंका बज गया है।

चुनाव को लेकर एरालोद मुखिया चौधरी अजित सिंह तो केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री डॉ. संजीव बालियान की प्रतिष्ठा दांव पर थी। जाटों में फिलहाल कौन पसंदीदा है, यह चुनाव परिणाम से साफ हो गया है।

कवाल के तिहरे हत्याकांड के बाद सुर्खियों में आए डॉ. संजीव बालियान ने लोकसभा चुनाव में रिकार्ड मतों से जीत हासिल की थी। उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी के चयन में बालियान की अहम भूमिका थी, क्योंकि टिकट के लिए 11 दावेदार लाइन में थे। भाजपा हाईकमान ने उनकी सलाह पर कपिलदेव अग्रवाल को टिकट मिला।

जिला पंचायत अध्यक्ष पद चुनाव में बालियान ने सपा को जबरदस्त पटखनी दी थी। आंचल तोमर को लालबत्ती दिलाने की व्यूह रचना उन्हीं की रही।

आखिर कांग्रेस को मिल ही गई संजीवनी
प्रदेश में अपनी जमीन तलाश रही कांग्रेस को मिली जीत मिशन-2017 की संजीवनी भी हो सकती है। इस जीत के जरिए पूर्व विधायक इमरान मसूद ने कांग्रेस को अपनी ताकत दिखाई।

इतना ही नहीं, चाचा को मात देकर सपा को भी अपने इरादे जता दिए हैं। हालांकि वर्ष 2012 में भी कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित प्रदर्शन किया था। उस वक्त काजी रशीद मसूद और इमरान मसूद साथ थे।

हालांकि चाचा भतीजे में अलगाव के बाद लगातार इनमें मुस्लिम मतों के लिए वर्चस्व की जंग जारी है।वर्ष 1980 से पहले तक कांग्रेस ने देशभर के मुसलमानों के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए जमीयत उलेमा-ए-हिंद के सदर मरहूम अशद मदनी को राज्यसभा भेजती रही थी।

वर्तमान में देवबंद में मिली कांग्रेस की इस जीत को बड़ी सफलता के रुप में देखा जा रहा है। ऐसे में सियासी गलियारे में चर्चा है कि कांग्रेस भी इमरान मसूद को अहमियत दे सकती है।
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