अधरमं, मधुरमं, वदनमं मधुरमं,
नैनं मधुरमं, हसितं मधुरमं,
हृदय मधुरमं, गमनम मधुरमं,
मधुराधिपते, अखिलम मधुरमं...
मधुराधिपते अखिलमं मधुरमं,
अखिलम मधुरमं...
राम स्वरूप के शतकीय उच्चारण से प्रभु भक्ति में डूबते कंठ को साधना की नई रीति, प्रीति से संवारने वाले संगीत मार्तंड पंडित जसराज शांति की अनंत यात्रा के साथी बन गए। दुनिया के समस्त विशिष्ट संगीत मंचों से सुरों द्वारा भक्ति की राह प्रशस्त करने वाले सरस्वती पुत्र के कदम मेरठ की माटी में भी पड़े। शारदा सुत के सुरों ने मेरठ की पुरवाई को दो बार महकाया।
संगीत के पुराने शौकीनों के अनुसार सुरसाधक पंडित जसराज दो बार मेरठ पधारे। पहली बार उनका आगमन 1971 में आरजी पीजी कॉलेज में हुआ। संस्था के समारोह के मेहमान बने। दूसरी दफा स्पिक मैके के सौजन्य से पंडितजी इस्माईल डिग्री कॉलेज में कांसर्ट के लिए आए।
उस रोज दो चांदनियों के विलक्षण दर्शन
इस्माईल् नेशनल महिला पीजी कॉलेज में संगीत विभाग में एचओडी पद से सेवानिवृत डॉ. सुधा रायजादा ऐसे ही एक पल की साक्षी है। कोरोना के आपातकाल में बुढ़ाना गेट में अपनी कोठी में समय बिता रही डॉ. सुधा पंडितजी के महाप्रयाण का समाचार सुनकर अवाक रह गई।