त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की आरक्षण प्रक्रिया में शासन भी अब कटघरे है। पहले चक्रानुक्रम से आरक्षण का आदेश होने के बाद बदलाव की प्रक्रिया। अब आरक्षण की पूरी प्रक्रिया में बदलाव की बात होने से अधिकारी तो परेशान है हीं दावेदार भी तनाव में है।
इस बार नये परिसीमन के तहत चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई है। धांधली के आरोपों के बीच कहा जा रहा है कि जिला पंचायत वार्ड परिसीमन में सपा नेताओं के इशारे पर उनके प्रभाव वाले गांवों का समूह तैयार किया गया है। इन पर आपत्तियां भी आयी, लेकिन किसी का भी निस्तारण नहीं हुआ। अब रैपिड़ सर्वे को लेकर आरोप लगे और मतदाता सूची का अनंतिम प्रकाशन हुआ तो उसमें तो अधिकांश गांवों से धांधली की शिकायतें रही है लेकिन निस्तारण बहुत कम हो पाया है।
आरक्षण प्रक्रिया को लेकर सबसे ज्यादा बवाल हो रहा है। शासन ने पहले वर्ष 2010 की तर्ज पर ही पंचायत चुनाव आरक्षण चक्रानुक्रम से करने का आदेश दिया था। इसमें ओबीसी आरक्षण परिवार संख्या के आधार पर करने का भी नियम था। इस आरक्षण का अंतिम प्रकाशन दो सितंबर को होना था। लेकिन बीच में ही आदेश आया कि ओबीसी आरक्षण परिवार नहीं जनसंख्या के आधार पर होना है। ऐसे में आरक्षण का कार्यक्रम चार सितंबर तक के लिए अटक गया और अब तिथि छह सितंबर हो गयी है।
इस बीच शासन ने पूरी आरक्षण प्रक्रिया में ही बदलाव की बात कही है। डीपीआरओ अनिल कुमार सिंह का कहना है कि अभी अधिकारिक सूचना प्राप्त नहीं हुई है लेकिन नयी नीति के तहत आरक्षण के संकेत मिले हैं। जिस गांव या वार्ड में बदलाव पचास प्रतिशत से अधिक है, उसका ही आरक्षण नये सिरे से तय होगा और अन्य चक्रानुक्रम से रखा जाएगा। इसके लिए अब अलग फार्मूला तैयार हो रहा है।
शासन के द्वारा लगातार हो रहे बदलाव और देरी से अधिकारी परेशान है। दावेदार और ग्रामीण भी शासन की कार्य प्रणाली पर सवाल उठाते हुए शंका जाहिर करने लगे हैं। दावेदारों का मानना है कि यह सब सपा समर्थित प्रत्याशियों को लाभ पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। ऐसे में यह आशंका है कि यदि ज्यादा फेरबदल हुआ तो मामला कोर्ट में जाकर फंस सकता है।