1971 के युद्ध के दौरान सरेंडर के कागजात पर साइन करते जनरल नियाजी
मेरठ। वर्ष-1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर भारत की फतह कई मायनों में खास थी। युद्ध बंदियों के मामले में जहां यह ऐतिहासिक घटना थी, वहीं एक नए देश बांग्लादेश का जन्म हुआ। भारतीय जांबाजों ने पाक को उसके घर में घुसकर सबक सिखाया था। इसी का नतीजा रहा कि 16 दिसंबर 1971 को पाक आर्मी के लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी के नेतृत्व में 90368 सैनिकों ने जंग के फील्ड कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने सरेंडर किया। इस जंग से मेरठ का भी जुड़ाव रहा। यह कि युद्ध में बंदी बनाए गए पांच हजार पाकिस्तानी सैनिक मेरठ छावनी में रखे गए थे। यहां उन्हें एक कंपाउंड बनाकर रखा गया था।
रुड़की रोड पर रखे गए सैनिक
1971 की जंग के बाद सरेंडर करते पाक सैनिक
मेरठ छावनी देश की बड़ी छावनियों में शामिल है। 1971 के युद्ध में सरेंडर करने वाले पाकिस्तानी सैनिक और अधिकारियों का एक बड़ा हिस्सा मेरठ छावनी भेज दिया गया था। इतिहासकार डॉ. केडी शर्मा के मुताबिक, रुड़की रोड पर जालों का एक कंपाउंड बनाकर पाक सैनिकों को रखा गया था। कंपाउंड के अंदर वे आजाद थे। बाहर और ऊपर से भारतीय सैनिक उनकी निगरानी करते थे। रुड़की रोड पर सड़क से आते-जाते लोग उन्हें देख सकते थे। हालांकि, आम नागरिकों से उनकी मुलाकात पर पाबंदी थी। हालांकि, वे युद्ध बंदी आपस में बातचीत कर सकते थे। उन्हें युद्ध बंदियों का हक प्राप्त था। उन्हें किसी भी तरह से परेशान नहीं होना पड़ा। शिमला समझौते के साथ सभी वापस भेज दिए गए थे।
इंदिरा गांधी ने मेरठ के शिक्षक की रिसर्च सराही थी
मेरठ कॉलेज के डिफेंस स्टडी के पूर्व हेड कैप्टन डॉ. एसके गर्ग ने की थी रिसर्च
भारत-पाक युद्ध पर मेरठ के शिक्षक के शोध को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी सराहा था। मेरठ कॉलेज के डिफेंस स्टडी डिपार्टमेंट के पूर्व हेड कैप्टन डॉ. एसके गर्ग ने पीएचडी में 1971 की जंग से जुड़ा टॉपिक लिया था। उन्होंने गुरिल्ला ऑपरेशन्स इन वार लिबरेशन इन बांग्लादेश विषय पर रिसर्च की। देश की कई लाइब्रेरी में रिसर्च ने जगह बनाई थी। इसके बाद कैप्टन गर्ग ने एक किताब भी लिखी। इसके विमोचन के लिए उन्होंने इंदिरा गांधी को निमंत्रण पत्र भेजा। इस पर इंदिरा गांधी ने कैप्टन एसके गर्ग को मिलने के लिए बुलाया। 22 जनवरी 1984 को इंदिरा गांधी से डॉ. गर्ग की मुलाकात हुई। उन्होंने कैप्टन की किताब का विमोचन किया। साथ ही एक लेक्चर देने की इजाजत भी दी। तब इंदिरा ब्यूरोक्रेट्स को 15 मिनट का वक्त दिया करती थीं। डॉ. गर्ग को लेक्चर के लिए एक घंटा मिला। पूर्व प्रधानमंत्री ने लेक्चर सुना। डॉ. गर्ग की किताब पर कई पूर्व सेनाध्यक्षों ने अपनी राय जाहिर की। इनमें जनरल मानेकशॉ, केएम करियप्पा, ओपी मल्होत्रा, एस वैद्य, केवी कृष्णा राव शामिल रहे। डॉ. गर्ग के मुताबिक, 1971 की जंग के दौरान पूर्वी पाकिस्तान की जनता ने भारतीय सेना का सपोर्ट किया। बारिश होने की वजह से युद्ध को टाला गया था। सेना को नदियां पार करने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ी। इसके लिए उन्हें लोकल लोगों ने बैलगाड़ी, ठेले और छोटी नावें उपलब्ध कराईं। लोकल लोगों ने इंटेलीजेंस का भी काम किया। यह सब इनपुट काम आया। डॉ. एसके गर्ग ने 1965 की लड़ाई भी लड़ी है। तब वह खेमकरण में कंपनी कमांडर थे।
पाकिस्तानी इन्फेंट्री को सात दिन घेरे रखा
मेजर जनरल जेआर भाटी (रिटायर) की बटालियन ने संभाला था मोर्चा
मेजर जनरल जेआर भाटी (रिटायर) की 19 पंजाब बटालियन ने पूर्वी पाकिस्तान में सात दिनों तक पाकिस्तानी इन्फेंट्री को घेरे रखा और उसे आगे नहीं बढ़ने दिया। भारतीय जवानों ने रेलवे ट्रैक पर कब्जा जमा लिया था। पाक सैनिक सरेंडर करने को मजबूर हो गए। बटालियन के सामने पाकिस्तान के छह हजार सैनिकों ने सरेंडर किया था। वह बटालियन की कंपनी को लीड कर रहे थे।
डिफेंस एंक्लेव निवासी मेजर जनरल जेआर भाटी ने 1971 की जंग का अनुभव साझा किया। बताया कि उन्होंने अगरतला से ढाका तक का सफर तय किया। बीच में आठ हमलों का करारा जवाब दिया। अखौड़ा रेलवे स्टेशन और माइल स्टोन 37 पर कब्जा जमाया। बराहमन बारिया कस्बे से भी पाक आर्मी को खदेड़ा। सबसे ज्यादा चुनौती मेघना नदी को पार करने में थी। दुश्मनों ने पुल उड़ा दिए थे। नदी पार करने में करीब दो घंटे लगे। स्थानीय लोग पाक सेना से आतंकित थे। भारतीय फौज की सहायता के लिए तैयार थे। बटालियन के साथ 10 बांग्लादेशी थे। इनकी मदद लोकल भाषा समझने में ली गई। पाक की 14 इन्फेंट्री डिविजन को भैरो बाजार में ही सीमित कर दिया।
6 माह बनियान-लुंगी में रहे जांबाज जैनी
मेरठ। युद्ध की तैयारी छह महीने पहले शुरू हो गई थी। पश्चिम बंगाल और असम में करीब 10 लाख शरणार्थी घुसने के बाद हालात प्रतिकूल हो गए थे। पाकिस्तान उन्हें वापस लेने को तैयार नहीं था। भारत ने छह कैंप लगाकर शरणार्थियों को जगह दी। ये कैंप अगरतला, सिलचर, गुवाहाटी, सिलीगुड़ी, रायगंज और शिलांग में लगाए गए थे। दोनों देशों के पांच किमी के दायरे को नो मिलिट्री जोन घोषित कर दिया गया था। मार्च में जंग की तैयारी शुरू हो गई थी। 29 अक्तूबर को पाक ने गलती की और बमबारी शुरू कर दी। जवाब में भारतीय फौज ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
6 माह बनियान-लुंगी में रहे जांबाज जैनी
मेजर जनरल एजेबी जैनी (रिटायर) उस वक्त थे कमांडो
जंग में मेजर जनरल एजेबी जैनी (रिटायर) कमांडो थे। एक्स फोर्स कमांडो में शामिल थे। मेजर जनरल जैनी के मुताबिक, उन्हें अचानक सूचना मिली। 11 दिन शादी को हुए थे। हवाई जहाज से उनकी टीम को बैरकपुर पहुंचाया गया। वहां मीटिंग के बाद रायगंज शरणार्थी कैंप की जिम्मेदारी दी गई। जंग में कई मोर्चे पर सेना के जांबाज जमे थे। पाकिस्तानियों ने पूर्वी पाक में कहर बरपाया था। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल याह्या खान के निर्देश पर उनकी सेना ने आतंक मचा दिया था। लूट, हत्या, बलात्कार की घिनौनी सामूहिक घटनाएं हो रही थीं। आठ साल से अधिक उम्र की लड़कियों के साथ बलात्कार और आठ साल तक के लड़कों की हत्या का फरमान सुना दिया गया था। शरणार्थी दहशत में थे। इनमें सिविलियन, मुक्त वाहिनी, पैरा मिलिट्री के जवान और नेता भी शामिल थे।
जैनी को जिम्मा दिया गया था कि वह नौजवानों को ट्रेनिंग देकर तैयार करें। उन्हें गोले बनाने, पुल उड़ाने, तोड़फोड़ करने, बिजली-पानी की लाइन उड़ाने की ट्रेनिंग दी गई। मनोबल बढ़ाया गया। ट्रेनिंग के बाद उनका हौसला बढ़ा। मौका मिलते ही वह उन्हें मैदान में उतार दिया गया। करीब छह माह तक वर्दी नहीं पहनी। बनियान, लुंगी, चप्पल में नौकरी की। घरवालों को महीनों खबर नहीं मिली तो पिता ने आर्मी कमांडर को पत्र लिखा। उन्होंने जवाब दिया कि उनका कैप्टन बेटा सकुशल है। ऑपरेशन इतना गुप्त था कि उनके द्वारा भेजी जाने वाली चिट्ठियां भी जला दी गईं। पेड़ों पर मचान बनाकर निगरानी की जाती थी। मेजर जनरल जैनी बताते हैं कि उनका हवलदार कहने लगा वह पेड़ पर चढ़कर चौकसी करेगा। आप नीचे उतरकर आराम कर लीजिए। जैसे ही नीचे उतरे हवलदार ऊपर चढ़ा स्नाइपर ने उसे शूट कर दिया। वह गोली उन्हें भी लग सकती थी।