केंद्र सरकार ने शनिवार को ‘वन रैंक वन पेंशन’ की घोषणा कर दी। लेकिन सभी मांगें नहीं मानी हैं। इससे पूर्व सैनिकों में रोष है। उन्होंने सरकार के इस फैसले का विरोध किया है।
देश में कई सालों से ‘वन रैंक वन पेंशन’ को लेकर आंदोलन चल रहा है। मेरठ में इस आंदोलन की कमान इंडियन एक्स-सर्विस लीग डिस्ट्रिक्ट मेरठ के हाथों में है। मेरठ में 35 हजार से ज्यादा पूर्व सैनिक हैं। जिस पर सरकार की इस घोेषणा का सीधा असर पड़ेगा। सरकार ने एक जुलाई से वन रैंक वन पेंशन लागू करने, न्यायिक आयोग की रिपोर्ट देने, पेंशन की समीक्षा पांच साल में करने, वीआरएस वालों को इसका फायदा न होने की मांग नहीं मानी है।
मेरठ में ही हुआ आंदोलन
इंडियन एक्स-सर्विस लीग डिस्ट्रिक्ट मेरठ के सदस्यों ने जहां जंतर मंतर पर आंदोलन में भाग लिया। वहीं 23 जुलाई को माल रोड स्थित सब एरिया कैंटीन परिसर से होते हुए टैंक चौराहा, सीडीए ऑफिस होते हुए कमिश्नरी चौराहे तक प्रदर्शन किया।
ऐसे शुरू हुआ आंदोलन
सन 1973 को तीसरे पे कमीशन में फौजियों की पेंशन 70 फीसदी से घटाकर 50 प्रतिशत और सिविलियन कर्मियों की पेंशन 30 फीसदी से बड़ाकर 50 फीसदी कर दी थी। इसके पश्चात किसी भी सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। सन 1980 में कांग्रेस सरकार द्वारा गठित ब्रिगेडियर केपी सिंह डेओ कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में वन रैंक वन पेंशन देने की सिफारिश की। 2011 में बनाई एक कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में सरकार से पूर्व सैनिकों को वन रैंक वन पेंशन देने की सिफारिश की थी। फरवरी 2014 में यूपीए सरकार ने भी सैनिकों को यह देने की घोषणा संसद के दोनों सदनों में की थी। 17 फरवरी 2014 को अंतिम बजट में वन रैंक वन पेंशन के लिए 500 करोड़ रुपये का भी प्रावधान किया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव से पहले कई बार वन पेंशन दिलाने की घोषणा की थी। तभी से पूर्व सैनिकों ने वन रैंक वन पेंशन को लेकर आंदोलन तेज कर दिया था।