नोट बंदी से रसोई भी अछूती नहीं है। फल और सब्जियों की वेराइटी पर पाबंदी लगानी पड़ गई है तो घर में सहेलियों की दावतें फिलहाल टाल दी गई हैं। यही नहीं, बच्चों के लंच बॉक्स और पति के ऑफिस के टिफिन में क्या दें, इसमें भी परेशानी पेश आ रही है। लंच, डिनर और ब्रेकफास्ट में वेराइटी का भी संकट है। महिलाएं कहती हैं कि हाथ में खुले पैसे हैं नहीं, जबकि घर स्वैप मशीन या दो हजार के नोट से नहीं चलता। किचन के लिए हमेशा चेंज पैसे चाहिए, जिससे कभी भी बिस्किट, ब्रेड, नमक, धनिया-मिर्च या अन्य सब्जियां ले सकें। लेकिन, हाथ में खुले पैसे ही नहीं होने से ये सारी चीजें बंद हो गई हैं। स्टॉक के राशन से काम चल रहा है, लेकिन किचन में सब्जी की रौनक खत्म हो गई है।
घटा गया खाने का जायका
गुरु नानक नगर निवासी सीमा कहती हैं कि जब से नोट बंदी हुई है, उसी दिन से खाने से स्वाद फीका पड़ने लगा है। धनिया, अदरक, लहसुन जैसी चीजों को लेकर परेशानी आ रही है। पनीर, दही, मट्ठा (छाछ) जैसी छोटी चीजें लेने में परेशानी हो रही है। खुले पैसे न होने से खाने में जायका तो घटा ही है। सोच-समझकर ऐसी चीजें बना रही हूं, जो बिना ज्यादा सामान के बन सकें।
सस्ती हैं मगर खरीदें कैसे
पंजाबीपुरा की स्वाति कहती हैं कि सब्जी और फल सस्ते तो हैं, लेकिन खरीदे कैसे। जेब में खुले पैसे नहीं हैं। बैंक वाले दो हजार का नोट थमा रहे हैं। अब दो हजार का नोट सब्जी, पनीर वाला तो लेगा नहीं। डेयरी, सब्जी और फल वाले को तो खुले पैसे देने होंगे। घर में बचे हुए फुटकर पैसे भी अब खत्म हो चुके हैं। कार्ड स्वैप कराकर हर चीज खरीदना आम आदमी के लिए तो मुश्किल ही है।
वेराइटी का आ रहा संकट
शारदा रोड निवासी मानसी कहती हैं कि आठ नवंबर के बाद से रसोई का सामान खरीदना एकदम आधा हो गया है। खुले पैसे न होने से बहुत ज्यादा सामान नहीं ले पा रहे हैं। लंच, ब्रेकफास्ट, डिनर में वेराइटी का संकट आ गया है। राजमा, दाल या कढ़ी बनाकर काम चला रहे हैं। लेकिन, वेराइटी फूड या बच्चों की हर फरमाइश का खाना नहीं बन पा रहा। किटी पार्टी भी टाल दी है, क्योंकि थोड़ा बहुत सामान तो हमेशा किचन में खरीदना पड़ता है।
रोजाना लंच बॉक्स में क्या दूं
पंजाबीपुरा निवासी रुना मुल्तानी के बच्चे स्कूल जाते हैं। वह कहती हैं कि बच्चों को रोजाना लंच बॉक्स देना होता है। इन दिनों यही सोचकर परेशान रहती हूं कि रोजाना लंच में क्या दूं। ब्रेड, पनीर, पाव जैसी छोटी चीजें भी नहीं खरीद पा रही हूं। बच्चे रोजाना पराठा, पूड़ी ले नहीं जाते। रोज सुबह लंच बॉक्स में क्या रखूं यह सोचने में परेशानी हो रही है। नाश्ते के विकल्प खत्म हो गए हैं।
नहीं बचे हैं खुले पैसे
शारदा रोड निवासी बरखा कहती हैं कि 10 दिनों से सब्जी बेनूर बन रही है। लाल घी और गरम मसाले से सब्जी की रंगत सुधार रही हूं। पहले सब्जी वाले से खुले पैसों से हर दो दिन में धनिया ले लेती थी। लेकिन, अब खुले पैसे नहीं हैं। सब्जी वाला 100 रुपए का धनिया तो देगा नहीं, इसलिए बिना धनिया के काम चला रही हूं। कितनी भी अच्छी सब्जी बनाओ, लेकिन हरी धनिया के बगैर सूनी लगती है।
आम आदमी को तो ध्यान में रखते
रसोई और घर चलाने में हो रही दिक्कतों के बीच ये महिलाएं केंद्र सरकार के फैसले को गलत नहीं मानतीं। उनका कहना है कि नोट बंदी को लेकर सरकार को आम आदमी की जरूरतों और परेशानियों को भी ध्यान में रखना था। व्यवस्थित तरीके से इसे लागू किया जाता तो बेहतर होता। उनका मानना है कि परेशानी बस कुछ दिनों की है। इसके बाद सकारात्मक नतीजे सामने आएंगे।