एचआईवी-टीबी से पीड़ित मरीजों का हाल महज एक मिस्ड कॉल से पता चल रहा है। दरअसल, स्वास्थ्य विभाग ने एक ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार किया है, जिससे यह पता चल जाता है कि मरीज रेग्युलर दवाइयां ले रहा है या नहीं। इसके लिए मरीज को दवा खाने के बाद मिस्ड कॉल देने होती है। अगर वह ऐसा नहीं करता है तो डॉक्टर उसके घर पहुंच जाते हैं। फिलहाल मेरठ में इन दिनों एचआईवी-टीबी से पीड़ित 31 मरीजों की इसी तरह मॉनिटरिंग की जा रही है।
जिला अस्पताल के एआरटी (एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी) सेंटर पर एचआईवी के साथ टीबी से पीड़ित मरीजों के लिए 99 डॉट्स दवा दी जा रही है। इसके लिए मरीज को क्षय रोग विभाग में आने की जरूरत नहीं है। मॉनिटरिंग के लिए मरीज द्वारा रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर से मिस्ड कॉल करने पर विभाग को पता चल जाता है कि मरीज ने दवाई खाई है या नहीं। अगर वह मिस्ड कॉल नहीं करता है तो डॉक्टर और स्टाफ उसके घर पहुंच जाता है। कई बार पता चलता है कि उसने दवाई खा ली थी लेकिन वह मिस्ड कॉल करना भूल गया। जबकि कई बार उसने दवाई ही नहीं खाई होती। तब उसे दवाई खिलाई जाती है। साथ ही उसे प्रेरित किया जाता है कि वह दवाइयां रेग्युलर खाएं।
टीबी विभाग के जिला सीनियर ट्रीटमेंट सुपरवाइजर अजय सक्सेना ने बताया कि अगर कोई मरीज टीबी और एचआईवी दोनों से पीड़ित है तो स्वास्थ्य विभाग उसके मोबाइल नंबर को 99 डॉट्स सॉफ्टवेयर पर रजिस्टर करेगा। मरीज को जो दवाइयां दी जाएंगी, उन पर टोल फ्री नंबर लिखे होंगे। मरीज को हर दिन दवा लेने के बाद टोल फ्री नंबर पर मिस्ड कॉल देनी होगी। इसके लिए मरीज दो से तीन दिन नंबर रजिस्टर्ड करा सकता है। मिस्ड कॉल 99 डॉट्स पोर्टल पर दिखाई देगा। इसके लिए छह लेयर मॉनिटरिंग की जा रही है।