एमडीए के कुछ कर्मचारियों ने लोहिया नगर योजना में निरस्त भूखंडों पर भूमाफिया की तरह फर्जीवाड़ा करते हुए करोड़ों रुपये का खेल कर दिया। ये भूखंड किस्तें जमा न होने पर निरस्त हुए थे। इस पर एमडीए कर्मियों ने खुद कुछ रकम जमा की और फर्जी तरीके से अपने लोगों को मूल आवंटी दिखाते हुए उनके नाम रजिस्ट्री करा दी। इसके बाद एक-एक कर इन भूखंडों का सौदा भी किया जा रहा है। इस खेल में सारी रकम कर्मचारियों की ही जेब में गई। एमडीए के खजाने में भूखंडों की शत-प्रतिशत रकम भी जमा नहीं हो सकी। यही नहीं, कर्मचारियों ने हेराफेरी के दौरान संबंधित भूखंडों की फाइलों से निरस्तीकरण की नोटशीट भी गायब कर दी। अब इस खेल का खुलासा होने पर योजना प्रभारी संबंधित कागजात तलब किए हैं।
वर्ष-1987 में आई एमडीए की लोहिया नगर योजना में 625 और 900 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से भूखंडों का आवंटन हुआ था। इनमें से काफी प्लॉट ऐसे रहे, जिनके आवंटियों ने वर्ष-1998 तक महज दस या पांच फीसदी रकम ही जमा की। इसके बाद किस्तें न जमा होने पर इन भूखंडों का आवंटन निरस्त कर दिया गया। इनमें ज्यादातर प्लॉट 300 और 114 वर्ग मीटर के थे।
ओटीएस को बना लिया हथियार
अब कुछ माह पहले आई ओटीएस योजना के बहाने एमडीए कर्मियों ने पूरे खेल की पटकथा रच दी। निरस्त प्लॉटों के खाते में अपनी जेब से ही दो से चार लाख रुपये तक डाल दिए। जबकि, इनका वर्तमान रेट कहीं ज्यादा था। इसके बाद फर्जी आवंटी तैयार कर फाइल पर लगी निरस्तीकरण की नोटशीट भी फाड़ दी गई। फर्जी आवंटियों को ही मूल आवंटी बताते हुए उनके नाम रजिस्ट्री कर दी गई। रजिस्ट्री पर लगे फोटो तक फर्जी हैं। उन लोगों में से ज्यादातर ने प्लॉट का दूसरे को सौदा भी कर दिया। इस तरह एमडीए को पांच से सात करोड़ रुपये का चूना लगा। दरअसल, उस समय रेट 625 और 900 रुपये प्रति वर्ग मीटर का था। अब उसी जमीन की कीमत दस हजार रुपये के भी पार है।
नियमों को रख दिया ताक पर
नियमों के तहत आवंटन निरस्त होने के बाद इन भूखंडों का नई दर पर नए सिरे से आवंटन होना था। इसकी सूचना बाकायदा प्रकाशित होती और नीलामी या लाटरी सिस्टम से भूखंड आवंटित होते। अहम बात यह है कि नई दर से आवंटन होता तो एमडीए को भारी मुनाफा होता। वजह यह कि जिस दर पर पहले ये आवंटन हुए थे, वहां अब उससे दस गुना से ज्यादा का रेट है। ऐसे में नई दर से जो पैसा एमडीए में जमा होना चाहिए था, वह हुआ ही नहीं। कर्मियों ने यहां फर्जी रिपोर्ट तैयार की। रजिस्ट्री की फाइलों पर पैसा जमा होने की जो रसीद लगती है, उसका मिलान कंप्यूटर सेक्शन से होता है। इसके बाद फाइल में लिखा जाता है कि संलग्नक रसीदों का मिलान कंप्यूटर सेक्शन के लेखा अनुभाग से किया गया। लेकिन, यह प्रक्रिया भी नहीं अपनाई गई।
तीन माह में 19 प्लाटों में खेल
तीन माह में ऐसे 19 भूखंडों में एमडीए कर्मियों ने यह खेल किया। इस योजना से संबंधित पटल पर तैनात दो लिपिकों ने पूरी पटकथा लिखी। हालांकि, अब इस पटल का चार्ज बदल गया है। हैरत की बात यह है कि लोहियानगर के आई पॉकेट में चार नंबर का प्लाट कॉर्नर का है और तीन सौ वर्ग मीटर का है, लेकिन रजिस्ट्री महज दो सौ वर्ग मीटर की ही की गई है। इसे लेकर संबंधित जेई की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। इसी तरह के पॉकेट के 29 और 62 के बीच भी गड़बड़ी की गई है। मूल आवंटन पत्र पर ब्लेड से खुरचकर नंबर बदला गया है।
कंप्यूटर में दर्ज है अभी सही रिकार्ड
लोहिया नगर के प्लॉट संख्या के-62, 1432, 1438, 1439, 1450 और आई-204 समेत कुल 19 प्लॉट सवालों के घेरे में हैं। इसकी गहन जांच हो तो संख्या में इजाफा संभव है। इसकी सूचना योजना प्रभारी जितेंद्र यादव को मिली तो उन्होंने जांच की। इसमें रजिस्टर में तीन प्लॉटों की रजिस्ट्री की पुष्टि हो गई। बाकी की भी जांच कराई जा रही है। इससे संबंधित सभी फाइलें तलब की गई हैं।
फाइलें हो सकती हैं गायब
एमडीए में महत्वपूर्ण और घोटाले से जुड़ी फाइलें पहले भी गायब हो चुकी हैं। ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस खेल की फाइलें सुरक्षित रहेंगी। हालांकि, ये फाइलें गायब हो भी गईं तो पूरा रिकार्ड कंप्यूटर में मौजूद है।