मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग में सोमवार को फ्रंटियर्स इन अल्गल रिसर्च : बायोडायवर्सिटी एंड बायोटेक्नोलॉजी विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम कराया गया। इसमें मुख्य वक्ता प्रो. अमरीक सिंह अहलूवालिया ने कहा कि शैवाल बायोटेक्नोलॉजी और जैव विविधता के क्षेत्र में नई चुनौतियों के साथ नए अनुसंधानों की जरूरत है। शैवाल जैव-विविधता के संरक्षण और सतत विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
कार्यक्रम का उद्घाटन विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. संगीता शुक्ला ने दीप प्रज्वलित कर किया। विभागाध्यक्ष डॉ. रमाकांत ने अतिथियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी के उद्देश्य बताए। उन्होंने शैवाल (अल्गी) अनुसंधान के महत्व, पर्यावरण संरक्षण, जैव-ईंधन उत्पादन, जैव-प्रौद्योगिकी एवं विभिन्न औद्योगिक उपयोगों में इसकी भूमिका के बारे में बताया।
अतिथि वक्ता के रूप में डॉ. नम्रता पाठक मौजूद रहीं। उन्होंने वैज्ञानिक शोध, जैव-प्रौद्योगिकी के नए कार्यों और नीतिगत पहलुओं पर प्रकाश डाला। इसके साथ ही भारत में बायोटेक्नोलॉजी क्षेत्र में हो रही प्रगति और भविष्य की संभावनाओं के बारे में बताया। डॉ. योगेश चंद्र ने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में नई उपचार पद्धतियों, प्रतिरोधक क्षमता के जोखिम एवं उनके संतुलित उपयोग पर चर्चा की।
वियतनाम के वैज्ञानिक डॉ. नयांग बाउ कवेक ने कैमेलिया चाय की विभिन्न किस्मों की आनुवंशिक विविधता पर अपना शोध प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि ऐसे शोध पौधों की आनुवंशिक विविधता समझने, गुणवत्ता सुधारने एवं संरक्षण में सहायक होते हैं। तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञों ने शैवाल की विविधता, जैव-ईंधन उत्पादन, पर्यावरण संरक्षण में भूमिका पर मंथन किया।