मोदीपुरम निवासी शर्मा जी अपने 15 वर्षीय बेटे की गिरती सेहत और अचानक से गुस्सा आने से परेशान थे। उन्होंने उसे एक मनोचिकित्सक को दिखाया तो काउंसिलिंग में पता चला कि उनका बेटा बीते दो साल से नशे की गोलियां ले रहा है। अगर नहीं लेता है तो अपना मानसिक संतुलन खो देता है। वहीं, गंगानगर निवासी वर्मा जी व उनकी पत्नी अपनी 18 साल की बेटी का दो माह से मेडिकल कॉलेज में इलाज करा रहे हैं। काउंसिलिंग के दौरान बेटी ने बताया कि जब वो 12वीं क्लास में थी तो पढ़ाई के प्रेशर में आने पर कोचिंग में उसे एक दोस्त ने एक च्युइंगम दी थी। उस वक्त उसका स्वाद काफी अटपटा था। लेकिन उस दिन शरीर में काफी एनर्जी महसूस हुई। जिस कारण मैंने अगले दिन भी उससे च्युइंगम लेकर खाई। अब उसे न खाऊं तो दिमाग काम करना छोड़ देता है।
ये दो उदाहरण यह बताने के लिए काफी हैं कि देश का भविष्य कैसे धीरे-धीरे नशे की गिरफ्त में आ रहा है। मेडिकल कालेज के मनोचिकित्सा विभाग में बीते कुछ माह में ऐसे युवा मरीजों की संख्या बढ़ी है, जो किसी न किसी कारण से नशे में जकड़ चुके हैं। चिंता की बात यह है कि इसमें से 30 फीसदी की उम्र 15 या उससे कम है। छह माह के आंकड़े बता रहे हैं कि पढ़ाई और कॅरियर बनाने की उम्र में महज शौक में नशा लेने का सफर उन्हें गहरे अंधकार में धकेल रहा है। कुछ बच्चों को तो पढ़ाई तक छोड़नी पड़ रही है। उनके अभिभावक इन परिस्थितियों में आर्थिक और मानसिक परेशानी उठा रहे हैं।
इस उम्र सीमा में यह सब
मनोचिकित्सा विभाग की स्टडी बता रही है कि छह माह में 162 से अधिक ऐसे मरीज आए हैं, जिनका नशा छुड़ाने के लिए ट्रीटमेंट शुरू करना पड़ा है। प्रत्येक माह का औसत निकाला जाए तो करीब 30 नए मरीजों की पहचान हो रही है, जो नशे के आदि हो चुके हैं। छह माह में कुल मरीजों में 53 यानी 30 फीसदी की उम्र 15 साल से भी कम पाई गई है। जो कक्षा 9-12 तक के स्टूडेंट्स हैं।
अनजाने में नशे का सफर
इन बच्चों की काउंसिलिंग से पता चला है कि हर किसी को किसी साथी ने नशे को तौर पर या तो कोई च्युइंगम दी या शक्तिवर्धक कैप्सूल। जिसे महज मौजमस्ती में अनजाने में ले तो लिया गया। लेकिन उसके बाद उसकी लत पड़ गई। छात्रों में यह नशा कैप्सूल से सिगरेट, बीयर, शराब और भांग तक पहुंच गया।
60 फीसदी 15-25 साल
आंकड़े बताते हैं कि मेडिकल कालेज में पंजीकृत नशे के नये मामलों में 60 फीसदी मरीजों की उम्र 15-20 साल तो 10 फीसदी की उम्र 20-30 साल है। चिकित्सक मानते हैं कि सबसे ज्यादा रिस्क 15 साल के बाद है। लेकिन इसे नकारा जा सकता है कि अब 9वीं या 10वीं क्लास में पढ़ने वाले बच्चों तक नशा पहुंच चुका है।
स्कूल-कॉलेज साफ्ट टारगेट
स्टडी बताती है कि नशे करने वाले कम उम्र के करीब 80 फीसदी बच्चों ने काउंसिलिंग के दौरान स्वीकार किया है कि नशे की लत उन्हें स्कूल या कॉलेज के दोस्त ने लगाई। किसी ने स्मोकिंग, पान, तंबाकू के जरिये नशा शुरू कराया तो किसी ने च्युइंगम या एनर्जी ड्रिंक पिलाकर नशा शुरू कराया।
अकेलापन बड़ा कारण
स्टडी में सामने आया है कि उच्च एवं मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चे सबसे ज्यादा रिस्क जोन में है। ऐसे परिवारों में माता-पिता बच्चों को प्रॉपर समय नहीं दे पा रहे हैं। जिसके चलते बच्चे दूसरों के झांसे में आसानी से फंस जाते हैं। कई फैमिली ऐसी सामने आई हैं, जिनमें माता-पिता दोनों नौकरी पेशा हैं। बच्चे दिन भर करीब 8-10 घंटे अकेले रहते हैं। ऐसे में बच्चे का गलत रास्ते पर जाना सबसे बड़ा कारण है। - डॉ. रवि राणा, मनोचिकित्सक मेडिकल कॉलेज
कॉरपोरेट कल्चर का नतीजा
सामाजिक ढांचे के पतन के साथ ही तमाम सारी बुराईयां शुरू हो जाती हैं। मौजूदा दौर कॉरपोरेट व व्यापार का है। जहां पर संयुक्त परिवार खत्म हो रहे हैं। ऐसी व्यवस्था में परिजन अपने बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं। जिससे बच्चों और अभिभावकों के बीच पैदा हुआ गेप ही नशे जैसी लत को बढ़ा रहा है। - प्रो. योगेंद्र सिंह, एचओडी समाजशास्त्र सीसीएसयू