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फौजी की जिंदादिली के कायल थे महेंद्र सिंह टिकैत, 1974 में हुए थे सेना में भर्ती

Sat, 23 Mar 2019 11:44 PM IST
कपिल kapil अवधेश पचौरी, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
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चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत से बातचीत करते हुए चंद्रपाल सिंह फौजी (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
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भाकियू के किसान आंदोलनों में चंद्रपाल फौजी निडरता की आवाज रहे। करीब तीन दशक तक उन्होंने पूरी निष्ठा से किसानों की समस्याओं को लेकर संघर्ष किया। भाकियू सुप्रीमो रहे चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत भी फौजी की जिंदादिली के कायल रहे थे। संगठन को मजबूत बनाने में उनकी अहम भूमिका रही। 

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बता दें कि शनिवार को उनका हार्टअटैक से निधन हो गया। उनके निधन से भारतीय किसान यूनियन में शोक की लहर दौड़ गई। शाम को मंसूरपुर आवास के पीछे उनके खेत में गमगीन माहौल में उनका अंतिम संस्कार किया गया।

मंसूरपुर क्षेत्र का गांव है दौलतपुर, यहीं के किसान रणवीर सिंह के घर में एक फरवरी 1954 को चंद्रपाल सिंह का जन्म हुआ। पढ़ाई के बाद 1974 में सेना में भर्ती हो गए। सन 1991 में आर्मी से रिटायरमेंट लिया और गांव में खेतीबाड़ी के साथ ही मंसूरपुर डिस्टलरी में भी नौकरी करने लगे। शामली के करमूखेड़ी बिजलीघर पर किसानों पर फायरिंग के बाद वह चौधरी टिकैत के आंदोलन में सक्रिय हो गए। मेरठ कमिश्नरी, वोट क्लब दिल्ली और लखनऊ के धरने में फौजी ने किसानों को एकजुट किया। बाबा टिकैत ने उन्हें सुना तो आगे बढ़ाने का फैसला लिया। पहले भाकियू का ब्लाक अध्यक्ष और जिलाध्यक्ष बना दिया। बीते सप्ताह मंसूरपुर चीनी मिल पर गन्ना आपूर्ति को लेकर रेलवे फाटक की व्यवस्था बनाने के लिए उन्होंने धरना दिया था। उनकी लगन की वजह से उन्हें भाकियू में मंडल, पश्चिमी यूपी अध्यक्ष का दायित्व मिला।

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वहीं कृषक आयोग के सदस्य धर्मेंद्र मलिक कहते हैं कि चंद्रपाल फौजी भाकियू के कर्मठ सिपाही थे। चौधरी टिकैत के साथ किसान आंदोलनों के दौरान कई बार जेल गए थे। पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन अध्यक्ष अशोक बालियान ने कहा कि चौधरी टिकैत के मुंह से निकला शब्द फौजी के लिए आदेश होता था। सैनिक की तरह अपनी बात पर अड़ जाते थे। तंग आए, जंग आए उनका जुमला काफी प्रसिद्ध हुआ।

महेंद्र सिंह टिकैत के सारथी बन गिरफ्तारी से बचाया था
वर्ष 2007 में मुख्यमंत्री मायावती पर चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत द्वारा टिप्पणी करने से उन पर मुकदमा दर्ज किया गया था। बिजनौर से ही पुलिस ने चौधरी टिकैत की घेराबंदी शुरू कर दी थी। उस समय उनकी गाड़ी चंद्रपाल फौजी चला रहे थे। उन्होंने चौधरी टिकैत को जानसठ और मंसूरपुर के जंगलों से निकाल कर सुरक्षित सिसौली पहुंचाया था।

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