अभी तक 53 मामलों की सुनवाई पूरी हो चुकी है, जिनमें किसी को सजा नहीं मिल पाई। इनमें 44 मुकदमे जिले के हैं, जबकि 9 शामली के है। कोर्ट में फिलहाल 118 मामले विचाराधीन है। हैरत की बात यह है कि शेष मुकदमों में 93 वादों में समझौता पत्र दाखिल करने की प्रक्रिया चल रही है। केवल वही मुकदमे गंभीरता से सुनवाई में है, जिनमें हत्या, रेप, आगजनी के केस है। ज्यादातर मामलों में साक्ष्य नहीं मिलने के कारण आरोपी बरी हो गए। अभी तक के नजरिये से देखा जाए तो दंगों के मुकदमों में गुनहगारों को सजा मिल पाएगी या नहीं, यह बड़ा सवाल है।
गवाह पक्षद्रोही हो रहे है तो अन्य मामलों में येन-केन-प्रकरण समझौतों की कवायद हो रही है। हालांकि दंगे के दौरान पुलिस की ओर से दर्ज किए गए आगजनी, तोडफ़ोड़ के मुकदमों को फर्जी तरीके से दर्ज किए जाने का भी मुद्दा है। उन्हें मुकदमों की वापसी के लिए फरवरी माह में लखनऊ में भाजपाइयों और खाप चौधरियों ने सीएम योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की थी।
बताते चले कि केवल कवाल कांड के पांच आरोपी फिलहाल जेल में बंद है। दंगे से पहले जानसठ कोतवाली के कवाल में हुई मलिकपुरा के ममेरे भाइयों की निर्मम हत्या से मुजफ्फरनगर का माहौल बिगड़ा था।
हिंसा का खौफ गांव में ऐसा फैला, जिससे डर कर 50955 ग्रामीण बेघर हो गए। मुजफ्फरनगर में 41 और शामली में 17 राहत कैंपों में शरण ली गई। तत्कालीन अखिलेश सरकार ने राहत कैंपों के लिए 5.28 करोड़ रुपये की राहत राशि दी। कैं पों में 11 बच्चों की मौत हो गई थी।
एसआईटी ने 2656 फर्जी नामजदगी की थी खत्म
पुलिस ने दंगे के बाद तत्काल मुजफ्फरनगर में 534 और शामली के थानों में 29 मुकदमे दर्ज करा दिए थे, जिनमें क्रमश: 6264 तथा 228 लोगों को नामजद किया गया था। एसआईटी ने मुकदमों की जांच की और फर्जी दर्ज कराए गए मुकदमे निरस्त कर दिए। एसआईटी ने मुजफ्फरनगर के 2544 तथा शामली के 112 लोगों की फर्जी नामजदगी खत्म की थी। बाद में दोनों जिलों के 171 मुकदमों में चार्जशीट दाखिल की थी।
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