मेरठ। भारत की संस्कृति और सभ्यता विश्व की प्राचीनतम हैं। संस्कृत ही विश्व की सभी भाषाओं की जननी है। शिक्षा मंत्रालय ने स्वीकार किया कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा हो। जिसे नई शिक्षा नीति में स्वीकार किया है। भारत के साथ ही स्वतंत्र देश जापान ने मातृभाषा को प्राथमिकता दी। ये विचार सीसीएसयू के कुलपति प्रो. एनके तनेजा ने शुक्रवार को हिंदी विभाग और वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग नई दिल्ली के तत्वावधान में तीन दिवसीय वेब संगोष्ठी के समापन सत्र में व्यक्त किए।
प्रति कुलपति प्रो. वाई विमला ने कहा कि विज्ञान तर्क पर आधारित होता है। तदभव शब्दों का प्रयोग भी उतना ही होता है जितना तत्सम शब्दों का होता है। विशिष्ट अतिथि प्रो. अवनीश कुमार, अध्यक्ष वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली ने कहा कि हमें विचार अपनी भाषा में ही आते हैं। क्रियान्वयन किसी भी भाषा में हो सकता है। ज्ञान-विज्ञान एवं शिक्षा अपनी भाषा में ही होना चाहिए। जयसिंह रावत, वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग नई दिल्ली ने कहा कि यदि शब्दावली में कोई शब्द नहीं मिलता तो आयोग को लिख सकते हैं।
विशिष्ट वक्ता प्रो. नरेश मिश्र, पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, केंद्रीय विवि हरियाणा ने कहा कि भाषा विज्ञान में केवल मानवीय भाषा का चिंतन होता है। विशिष्ट वक्ता प्रो. अनुपम श्रीवास्तव, केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा ने कहा कि हिंदी में जारी अनुसंधान में आयोग की शब्दावली महत्वपूर्ण सिद्ध होगी। इसके उपरांत विशिष्ट वक्ता अनिल जोशी, प्रो. हेमंत जोशी ने भी विचार रखे। इसके पश्चात हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. नवीन चंद्र लोहनी ने आभार जताया। संचालन डॉ. अंजू ने किया। यहां डॉ. विद्यासागर सिंह, डॉ. यज्ञेश कुमार, डॉ. प्रवीण कटारिया आदि मौजूद रहे।