असहयोग आंदोलन में मेरठ कॉलेज के छात्र क्रांतिकारियों के साथ कंधे से कंधा मिलकर चले थे। उस समय काकोरी षड़यंत्र केस चल रहा था, जब मैंने हापुड़ के नूरपुर से आकर मेरठ कॉलेज में 11वीं में प्रवेश लिया था। यहीं से चंद्रशेखर आजाद और सरदार भगत सिंह के साथ जुड़ गए। छात्रों ने तय कि देश को आजाद कराने का सबसे अच्छा तरीका क्रांतिकारियों का है। ये संस्मरण राजेंद्रपाल सिंह वारियर ने अपनी पुस्तक (एक क्रांतिकारी के संस्मरण) में लिखे हैं।
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जनहित क्रांतिकारी संगठन के अध्यक्ष अजय वारियर ने बताया कि उनके दादा राजेंद्रपाल सिंह वारियर आठ साल जेल में रहे। वह सर्वप्रथम शीला के नाम से मशहूर सुशीला दीदी और भगवती चरण बोहरा की धर्म पत्नी दुर्गा देवी से मिले।
राजेंद्र पाल सिंह ने बताया कि एक बार मुझे कॉलेज हॉस्टल से शीला दीदी के घर बुलाया गया। वहीं पर भगत सिंह से पहली मुलाकात हुई। उस समय कॉलेज में तीन हिंदू और एक मुस्लिम हॉस्टल था। भगत सिंह ने मैदान में बैठकर पार्टी के बारे में समझाया। इसमें धन और कारतूस एकत्र करना और सभी राज खुफिया रखना था।
राजेंद्र पाल सिंह ने बताया कि इसके बाद वह पार्टी के लिए चंदा एकत्र करने में जुट गए। उन्होंने सर्वप्रथम डॉ. भोपाल सिंह से एक हजार रुपये चंदा लिया और भगत सिंह तक पहुंचाया। भगत सिंह लगातार मेरठ आते रहे। इसी दौरान भगत सिंह ने सेंट्रल असेम्बली में बम विस्फोट कर दिया।
हॉस्टल में आकर मिले चंद्रशेखर आजाद
भगत सिंह ने मेरठ कॉलेज में राजेंद्र पाल सिंह का कमरा नंबर चंद्रशेखर आजाद को बताया था। चंद्रशेखर आजाद जब हॉस्टल आए तो बातचीत के लिए मैदान में ले गए। उन्होंने बताया कि पार्टी का नियम है कि अगर पुलिस वारदात हो खूब गोलियां चलनी चाहिए।
चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि भगत सिंह को पंजाब सेंट्रल जेल से छुड़ाना है। 24 घंटे में 500 रुपये का इंतजाम करो। रातों-रात 50 मील साइकिल चलाकर राजेंद्र पाल किरठल में सेठ रामगोपाल के यहां पहुंचे। दो सोने के कड़े शहर सराफा बाजार में बेचे और 600 रुपये चंद्रशेखर को दिए।