भाजपा ने मिशन 2019 के तहत दलित और पिछड़ों को साधने की कवायद शुरू की है। दो दिवसीय प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में भी तमाम दिग्गज नेताओं का इसी पर जोर रहा। लेकिन भाजपा की इस कवायद से उसे झटका भी लग सकता है। क्योंकि जिस तरह अगड़ों की नाराजगी नजर आ रही है, उससे पिछड़ों को साधने में यदि अगड़े खिसक गए तो भाजपा की स्थिति और ज्यादा खराब हो सकती है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक और जातीय संघर्ष होते रहे हैं। यह खाई वर्षों से चली आ रही है। जिसे पाटने में अभी तक कोई कामयाब नहीं हुआ है। भाजपा की प्रदेश में सरकार बनने के बाद सांप्रदायिक दंगों पर तो रोक लगी है। लेकिन जिस तरह पिछले लगभग छह माह से जातीय विद्वेष बढ़ रहा है, वह चिंता का विषय है। लगातार जातीय संघर्ष हो रहे हैं। भाजपा के लिए भीम आर्मी बड़ी चुनौती बनी है। मेरठ के भी दो गांवों में एक सप्ताह पूर्व ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं। वहीं, दो अप्रैल की घटना के बाद दलित वर्ग भाजपा से कटा हुआ नजर आ रहा है।
ऐसे में भाजपा ने इस वोट बैंक को साधने के लिए जहां पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया और दलित उत्पीड़न को लेकर अलग से विधेयक पारित कराया। उसे लेकर सवर्ण जाति के लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया पर यह नाराजगी खुलकर सामने आ रही है। जो कल तक भाजपा का गुणगान करते नजर आते थे, वहीं अब जमकर आग उगल रहे हैं। ऐसे में भाजपा को दलित और पिछड़ों को साधने का यह कार्ड कहीं भारी न पड़ जाए।