आशुतोष भारद्वाज
मेरठ। कैंची और स्पोर्ट्स के बाद मेरठ ने एक और गौरवशाली इबारत लिख दी है। हमारा विश्व प्रसिद्ध वाद्य यंत्र बिगुल को आधिकारिक रूप से भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्रदान किया गया है। इस टैग के साथ अब मेरठ का बिगुल विश्वभर में अपनी अलग पहचान के साथ जाना जाएगा। जीआई टैग से शहर के कारीगरों की मेहनत को सम्मान मिला है। इसके अलावा यह 200 साल पुरानी विरासत को विश्व स्तर पर स्थापित करने का मौका भी माना जा रहा है।
- 1885 में पहली बार जलीकोठी में बनाया गया था बिगुल
- शहर में बिगुल निर्माण 1885 से शुरू हुआ। नादिर अली एंड कंपनी ने इस कारोबार की नींव रखी। आज भी यह कंपनी परिवार की पीढ़ी दर पीढ़ी इस कार्य को कर रही है। इसके अलावा 500 से अधिक शहर में छोटी बड़ी कंपनी इस तरह के वाद्य यंत्र बना रही हैं। नादिर अली के संचालक फैज नादिर अली ने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पहले स्थापना दिवस पर मेरठ का ही बिगुल बजाया गया। यह मेरठ के लिए गर्व की बात है।
- फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ ने मेरठ से खरीदा था बिगुल
- 1971 के भारत पाक युद्ध के दौरान फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ ने मेरठ से विशेष रूप से बिगुल खरीदा था। उस समय भारतीय सेना की विजय में इस बिगुल की ध्वनि ने सैनिकों का मनोबल बढ़ाया। फैजा नादिर अली ने बताया कि आज भी भारतीय सेना, अर्धसैनिक बल, सीआरपीएफ, बीएसएफ, पीएसी और अन्य सुरक्षा बलों में मेरठ के बिगुल का व्यापक प्रयोग होता है। बैंड वादन, परेड और राष्ट्रीय आयोजनों में इसकी गूंज सुनाई देती है।
- पीतल की शीट को हाथ पीटकर दिया जाता है आकार
- फैज नादिर अली ने बताया कि बिगुल बनाने की कला काफी जटिल है। पीतल की शीट को हाथ से पीटकर आकार दिया जाता है। फिर उसमें विशेष सुर ताल सेट किया जाता है। एक बिगुल तैयार करने में कई दिन लगते हैं। मेरठ के कारीगरों की यह कला पीढ़ियों से चली आ रही है। जीआई टैग मिलने से अलग पहचान होगी। इससे स्थानीय कारीगरों को आर्थिक सुरक्षा मिलेगी। बाजार में नकली उत्पादों पर रोक लगेगी।
कारोबार से जुड़े हैं 5 हजार परिवार
- बिगुल निर्माण से 5 हजार से अधिक परिवार जुड़े हैं। यह उद्योग शहर की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विदेशी बाजारों में भारतीय सैन्य परंपरा से जुड़े इस वाद्ययंत्र की मांग पहले से ही है। अब यह मांग और बढ़ेगी। फैज नादिर अली ने बताया कि बीपीआरडी से भी बातचीत फाइनल हो गई। ऐसे में अब फोर्स सिर्फ ओएमई ऑरिज्नल इक्विपमेंट मैन्यूफेक्चरों से ही माल खरीदेंगी।
शहर में निर्माण स्थान: जली कोठी, पूर्वा फैयाज अली, पूर्वा अहमदनगर
मुख्य निर्माता: 65
कारोबार से जुड़े परिवार: 5 हजार
शहर में रजिस्टर्ड रिटेलर: 250
एमएसएमई: 500
कारोबार: 100 करोड़ सालाना
बिगुल को जीआई टैग मिलने पर व्यापारियों ने मनाई खुशियां
- पद्मश्री डॉ. रजनीशकांत ने शहर के वाद्य यंत्र निर्माताओं को दीं शुभकामनाएं
माई सिटी रिपोर्ट
मेरठ। शहर के बिगुल को जीआई टैग स्वीकृत होने बैंड बाजा व्यापारियों ने खुशियां मनाईं। व्यापारियों को उम्मीद है कि इस कारोबार को भविष्य में ओडीओपी में भी शामिल किया जाएगा। जीआई मैन ऑफ इंडिया के नाम से ख्याति प्राप्त दिल्ली निवासी पद्मश्री डॉ. रजनीकांत ने बताया कि मेरठ से बिगुल संगीत वाद्य यंत्र के लिए मेरठ वाद्य यंत्र निर्माता विक्रेता व्यापारी वेलफेयर एसोसिएशन ने नाबार्ड उत्तर प्रदेश और जिला प्रशासन से आवेदन किया था।
पद्मश्री डॉ. रजनीकांत ने बताया कि मेरठ अपने संगीत वाद्य यंत्र निर्माता के रूप में पूरी दुनिया में जाना जाता है। आज भी बड़ी संख्या में यहां से बिगुल, ट्रांपेट, ड्रम सहित 10 अलग अलग तरह के वाद्य यंत्र विवाह सहित अन्य आयोजनों की शोभा बढ़ाते हैं। इन वाद्य यंत्रों के बिना विवाह आयोजन भी अधूरे रहते हैं। जीआई टैग मिलने पर व्यापारियों ने जली कोठी में खुशियां मनाई। इस अवसर पर मोहित चौपड़ा, हाजी रहमुद्दीन, हाजी उवैस, रमन मेहरा, सादिक, राजू मेहरा रहे।
1857 के प्रथम क्रांति संग्राम में भी बिगुल का योगदान
पद्मश्री डॉ. रजनीकांत ने बताया कि शहर मेरठ के बिगुल का 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन में भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। आज भी स्कूलों से लेकर सेना, पुलिस में भी नियमित रूप से बिगुल बजा कर ही विभिन्न कार्यक्रम की शुरुआत होती है। बिगुल भारत की बौद्धिक संपदा है। उन्होंने मेरठ के वाद्य यंत्र व्यापारी और निर्माताओं को उपलब्धि के लिए शुभकामनाएं दीं। इतिहासकार एके गांधी ने बताया कि बिगुल की आवाज सुनकर ही शहर के सिपाही एकजुट हुए।
बिगुल- फोटो : संवाद