दूसरी पुस्तक: Overthinking: The Real Truth
ओवरथिंकिंग अब सिर्फ एक शब्द नहीं बल्कि यह आज की पूरी पीढ़ी का मन का शोर है। दूसरी किताब में वंश ने भावनाओं को मनोवैज्ञानिक आधार के साथ जोड़ने की कोशिश की है।
उनकी भाषा सरल है, लेकिन विषय की गंभीरता कहीं भी हल्की दिखाई नहीं पड़ती। व्यक्ति का दिमाग किस तरह विचारों के घेरे में फंसता है, दिल और दिमाग के बीच कैसे संघर्ष बढ़ता है, ओवरथिंकिंग क्या है और कैसे एक मामूली सोच खयाल नहीं बल्कि भार बन जाती है।
ये किताब पाठक को एहसास कराती है कि तुम अकेले ऐसे नहीं हो जो इस एहसास से गुजर रहे हो बल्कि हम सभी इससे गुजर रहे हैं। किताब संवेदनशीलता, सजगता और ईमानदारी से अपनी बात रखती है। युवा लेखक की बात करें तो वंश इस किताब के माध्यम से ये एहसास कराते हैं कि अनुभव सिर्फ उम्र से नहीं बल्कि देखने, सुनने और समाज की समस्याओं, बदलावों को नजदीक से महसूस करने पर आते हैं। इस किताब के माध्यम से वह उन युवाओं की आवाज बनते हैं जिनके सपनों को गंभीरता से नहीं लिया जाता, जिनकी संवेदनाएं ड्रामा कहकर टाल दी जाती हैं। ये किताब एक संदेश देती है कि इंतजार मत करो कलम उठाओ और उन्हें लिख डालो।