धरनास्थल पर कहीं हवन और कहीं नमाज
उस दौर को देखने वाले लोग बताते हैं कि आंदोलन स्थल पर कोई भूखा नहीं सोता था। गांवों से दूध आता था, रोटियां आती थीं, गुड़ आता था। यह केवल आंदोलन नहीं था, गांवों का सामूहिक परिवार था। मेरठ आंदोलन की सबसे बड़ी खूबसूरती यह थी कि 1987 के दंगों से टूट चुके समाज को जोड़ने का काम किया।
धरनास्थल पर नमाज भी हुई और हवन भी। उस समय किसान पहचान, धर्म से बड़ी हो गई थी। फिर आया 31 अक्तूबर 1988 और दिल्ली का वोट क्लब। भारतीय किसान आंदोलन का शायद सबसे बड़ा दिन।
दिल्ली ने पहली बार गांव की ताकत को इतने करीब से देखा था। इंडिया गेट, विजय चौक और वोट क्लब किसान समुद्र में बदल गए थे। हालत ऐसे बने कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को अपनी प्रस्तावित रैली का स्थान बदलना पड़ा। यह केवल राजनीतिक घटना नहीं थी।
यह उस किसान की दस्तक थी, जिसे लंबे समय तक केवल वोट देने वाली भीड़ समझा गया था। महेंद्र सिंह टिकैत ने गांव के आदमी को यह एहसास कराया कि वह किसी नेता या दल का मोहताज नहीं है। वह खुद अपनी लड़ाई लड़ सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि टिकैत में कोई पारंपरिक राजनीतिक गुण नहीं थे। वह महाभारत के उदाहरण देते थे, गांव की भाषा बोलते थे और किसानों से कहते थे कि सच्चाई की लड़ाई कभी हारती नहीं। शायद यही सादगी किसानों के दिल में उतर जाती थी।
उनके आंदोलनों में गुस्सा था, लेकिन हिंसा नहीं थी। लाखों किसानों की भीड़ के बावजूद न आगजनी, न तोड़फोड़। यह आज के दौर में लगभग असंभव सा लगता है। टिकैत जानते थे कि किसान की असली ताकत अनुशासन और नैतिक दबाव है।
संघर्ष की मजबूत साथी रहीं पत्नी
उनकी पत्नी बलजोरी देवी भी इस संघर्ष की मजबूत साथी थीं। जब बाबा आंदोलन या जेल में होते थे तो वह घर और संगठन दोनों संभालती थीं। लखनऊ आंदोलन में पुलिस लाठीचार्ज के दौरान घायल होने के बाद भी वह पीछे नहीं हटीं। यह केवल एक नेता की कहानी नहीं थी, बल्कि पूरे किसान परिवार के संघर्ष की कहानी थी।
आज गांव बदल गए हैं। चौपालें सिमट गई हैं। हुक्के की जगह मोबाइल ने ले ली है। आंदोलन अब कैमरों और सोशल मीडिया के दौर में पहुंच गए हैं। खेती पर संकट के दौर में किसान आत्मविश्वास खोता दिखाई देता है, तब बाबा टिकैत की याद और ज्यादा आती है। वो इसलिए कि उन्होंने किसान को डरना छोड़ लड़ना सिखाया था।
उनकी सबसे बड़ी विरासत यही है कि उन्होंने गांव के आदमी को सिर उठाकर खड़ा होना सिखाया। महेंद्र सिंह टिकैत चले गए, लेकिन खेतों की मेड़ों पर आज भी उनकी आवाज गूंजती है। जब भी कोई किसान अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है, कहीं न कहीं सिसौली का वह बाबा उसके भीतर जिंदा दिखाई देता है।