आरोप है कि यह पूरा खेल मेरठ विकास प्राधिकरण (मेडा) के अधिकारियों की सांठगांठ से हुआ, जो कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति करते रहे। मेडा ने जनपद को चार जोन में बांटा है। जोन-ए में 16,726 भवनों को अवैध घोषित कर 21 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में आख्या प्रस्तुत की गई थी। वहीं, जोन-बी में उल्देपुर गांव आता है, जहां सबसे ज्यादा अवैध कॉलोनियां विकसित हुईं और यहां निकिता सिंह पिछले दो साल से जोन प्रभारी के रूप में तैनात हैं।
प्राधिकरण के दस्तावेजों में उल्देपुर की 12 से ज्यादा अवैध कॉलोनियों पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई दर्ज है, लेकिन सवाल यह है कि ध्वस्तीकरण के बावजूद यहां कॉलोनियां कैसे दोबारा विकसित हो गईं। हालात यह हैं कि विद्युत विभाग ने खंभे लगाकर बिजली लाइन चालू कर दी, लोग मकान बनाकर रहने लगे और बाहर बाजार तक बन गई, लेकिन प्राधिकरण आंखें मूंदे रहा। अफसरों में खलबली,
प्रॉपर्टी एजेंटों ने लोगों को सपना दिखाकर बना डाली अवैध कॉलोनियां
उल्देपुर गांव में विकसित अवैध कॉलोनियों को देखकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक आयोग के अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश सुधांशु धूलिया और पूर्व न्यायाधीश ब्रह्म सिंह वर्मा भी हैरान रह गए। उन्होंने कहा कि प्रॉपर्टी एजेंटों ने लोगों को सपने दिखाकर इन कॉलोनियों का निर्माण किया है। बाउंड्रीवाल की रंगीन दीवारों, मुख्य गेट पर बनी मार्केट और दुकानों को देखकर उन्होंने दस्तावेजों की जांच की और अंदेशा जताया कि यहाँ प्रॉपर्टी को कई बार बेचा गया है।
न्यायिक आयोग इस बात की जांच कर रहा है कि इन कॉलोनियों की जमीन किसकी थी, खरीद-फरोख्त कैसे हुई और लंबे समय तक अवैध निर्माण होने के बावजूद प्राधिकरण ने कार्रवाई क्यों नहीं की। जांच का मुख्य पहलू यह है कि क्या इसमें प्राधिकरण के अधिकारियों की मिलीभगत थी। निरीक्षण के दौरान स्थानीय लोगों से कोई बातचीत किए बिना दोनों पूर्व न्यायाधीशों ने दस्तावेज लेकर भौगोलिक स्थिति को बारीकी से समझा। वर्तमान में यहाँ मार्केट और दुकानों के साथ-साथ लोग घर बनाकर रह रहे हैं।