शहर की जनता को मिलने वाला गंगाजल उप्र के दो बड़े नेताओं के बीच फंस गया है। तीन साल से सिंचाई विभाग लगातार नगर विकास विभाग से धन की मांग कर रहा है, लेकिन वह धन जारी करने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में नगर विकास मंत्री आजम खां सिंचाई मंत्री शिवपाल यादव पर भारी पड़ रहे हैं। यही कारण है कि 2013 में मिलने वाला गंगाजल शहर की जनता को आज तक नसीब नहीं हुआ है।
जेएनएनयूआरएम के तहत 2010 में शहर में लगभग साढ़े तीन सौ करोड़ रुपये से गंगाजल योजना शुरू हुई थी। लगभग साढ़े तीन सौ करोड़ रुपये खर्च करके शहर भर में पानी की पाइप लाइन डाली गई। लेकिन अभी तक गंगाजल नहीं मिला है। सिंचाई विभाग ने नगर विकास विभाग से 34 करोड़ रुपये की मांग की थी। नगर विकास मंत्रालय ने मात्र 12 करोड़ रुपये दिए हैं। जबकि सिंचाई विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सिंचाई विभाग अपने खजाने से 20 करोड़ रुपये खर्च चुका है। पूरा धन मिलने के बाद ही पानी दिया जा सकेगा। धन को लेकर लखनऊ में सिंचाई मंत्रालय और नगर विकास मंत्रालय की कई बार बैठक भी हो चुकी हैं।
मुख्य और छोटी लाइन की चेकिंग हो चुकी है। पाइप लाइन में गंगाजल छोड़ने की जिम्मेदारी सिंचाई विभाग की है। सरकार से धन न मिलने की बात कहकर सिंचाई विभाग पानी नहीं दे रहा है। पीपी अग्रवाल, परियोजना प्रबंधक जल निगम
गंगाजल को लेकर कई बार जल निगम के अधिकारियों से वार्ता कर चुके हैं। शासन को भी पत्र भेजा गया है। गंगाजल को लेकर उप्र सरकार की मंशा साफ नहीं है। साढ़े तीन साल में सरकार को कई पत्र लिखे हैं। सरकार ही नहीं चाहती कि मेरठ जनता को गंगाजल मिले।
हरिकांत अहलूवालिया, महापौर
हमने अपने खजाने से भोला की झाल पर लगभग 20 करोड़ रुपये खर्च कर दिए हैं। शासन से 34 करोड़ रुपये की मांग की गई थी। अभी तक मात्र 12 करोड़ रुपये ही मिले हैं। कई बार शासन में बैठक हो चुकी है। जब तक पूरा पैसा नहीं मिल जाता, तब तक भोलाझाल से पानी दिया जाना संभव नहीं है।
आरके जैन, अधिशासी अभियंता गंगनहर सिंचाई विभाग