मेरठ की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री आम बजट की गुगली से बोल्ड हो गई। चमत्कार की आस लगाए बैठी विश्व पटल पर नाम रोशन करने वाली इस इंडस्ट्री के हाथ निराशा ही लगी है। उद्यमियों का कहना है कि लंबे-चौड़े दावे करने वाली केंद्र सरकार ने बजट में स्पोर्ट्स इंडस्ट्री की पूरी तरह अनदेखी की है।
मेरठ और जालंधर में खेल इकाइयों का वर्चस्व है। मेरठ में स्पोर्ट्स कारोबार से 35 हजार से ज्यादा परिवार प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। इन इकाइयों में विश्वस्तरीय क्रिकेट किट, एथलेटिक्स इक्युपमेंट्स, टेबिल टेनिस, फुटबाल, हॉकी समेत सभी तरह के स्पोर्ट्स गुड्स बनाए जाते हैं।
सालाना डेढ़ हजार करोड़ के कारोबार की मेरठ में ढाई हजार से ज्यादा छोटी-बड़ी स्पोर्ट्स गुड्स इकाइयां संचालित हैं। वैश्वीकरण के चलते मिलने वाली चुनौतियों के बाद भी इस उद्योग को केंद्र सरकार से कोई सहयोग नहीं है।
मोदी सरकार का वो नारा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मेक इन इंडिया का नारा देने के बाद स्पोर्ट्स उद्यमियों को इस बजट से काफी उम्मीदें थीं, लेकिन एक भी पूरी नहीं हो सकी।
यह चाहते थे उद्यमी
- खेल उत्पाद और खेल परिधानों पर एक अप्रैल 2011 में लागू की गई एक्साइज ड्यूटी खत्म हो
- क्रिकेट बैट बनाने वाली कश्मीरी विलो से प्रतिबंध खत्म हो, इंग्लिश विलो पर छूट दी जाए
- स्पोर्ट्स उत्पादों के कच्चे माल में सब्सिडी, स्पोर्ट्स इंडस्ट्री के विकास को स्पेशल पैकेज
- कैश पेमेंट की लिमिट 20 हजार से बढ़ाकर एक लाख हो
- कच्चे माल और मशीनों पर सब्सिडी
- खेल उद्योग के लिए सस्ता लोन की व्यवस्था