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काम नहीं योजनाएं बनाने से ही निगम अफसरों की नौकरी पक्की, विकास के नाम पर ठेंगा

Mon, 10 Dec 2018 04:21 PM IST
राजकुमार सैनी, अमर उजाला, मेरठ
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नगर निगम ऑफिस मेरठ - फोटो : अमर उजाला
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मेरठ शहर के विकास की योजनाएं बनाने में ही अपनी नौकरी पक्की करने वाले नगर निगम के कई अधिकारी नाकाम साबित हुए हैं। महानगर में ज्यादा नहीं तो पांच साल की पांच प्रमुख योजनाओं का हश्र निगम प्रबंधन की पोल खोलने के लिए काफी है। अधिकारी आए दिन नई योजनाओं के साथ जनता को सपना दिखाने का काम कर रहे हैं। लेकिन खजाने से पैसा निकलने के बाद विकास के नाम पर ठेंगा दिखा दिया जाता है। कारण है कि योजनाएं धरातल पर ही नहीं उतरीं।

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नगर निगम में आजकल शहर को विकास के पथ पर ले जाने के बजाय नौकरी चलाओ अभियान चल रहा है। इसके लिए योजनाएं तो धड़ाधड़ बन रही हैं और उनके नाम से जनता का पैसा भी खर्च हो रहा है। लेकिन बस विकास ही नहीं हो रहा है। जनता के गुस्से से बचने के लिए अधिकारी ऐसे सपने दिखाते हैं कि शहर जल्द ही चमन बन जाएगा। कूड़े के ढेर साफ हो जाएंगे। कहीं जलभराव नहीं होगा। बेहतर सड़कें होंगी तो सरकारी जमीनों पर निर्माण कराकर खजाना भरा जाएगा। लेकिन सब हवाई साबित हो रहे हैं। कहीं कोई काम नहीं हुआ।

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योजना- 1
पूर्व नगरायुक्त अब्दुल समद ने महानगर में खाली पड़ी सरकारी जमीनों को अवैध कब्जों से बचाने और निगम की आय बढ़ाकर शहर के विकास में चार चांद लगाने के लिए सरकारी भूमि पर बहुमंजिला भवन बनाने की योजना तैयार की थी। इसे शासन से स्वीकृति के लिए भी भेजा गया था। न तो शासन से फाइल लौटी और न ही स्थानीय स्तर पर कार्य हुआ। चार साल से ज्यादा समय हो चुका है। पहले से ज्यादा कब्जे हो गए।

योजना- 2
पूर्व नगरायुक्त देवेंद्र कुशवाहा ने नालों और सड़क किनारे पॉलीथिन और कूड़ा डालने वाले वालों पर शिकंजा कसने के लिए करीब 30 कैमरे खरीदवाए थे। वह कैमरे पिछले साल ही सफाई इंस्पेक्टरों को बांटे गए। सरकारी खजाने से दो लाख के करीब खर्च हुआ। लेकिन कैमरों का उपयोग नहीं हुआ। कैमरे कहां हैं और उनका उपयोग क्यों नहीं हुआ। इसको पूछने वाला भी कोई नहीं है। इसलिए इस योजना का भी हाल अन्य की तरह हुआ।

योजना- 3
स्वच्छ भारत मिशन के तहत हर घर में हरे और नीले रंग के डस्टबिन बांटे जाने थे। इसकी घोषणा भी कर दी गयी थी। निगम के वार्ड नंबर एक लल्लापुरा में डस्टबिन वितरण कार्यक्रम आयोजित करके औपचारिकता पूरी की गयी थी। उसके बाद किसी को कोई डस्टबिन नहीं बांटा गया। इतना जरूर हुआ कि जो शहर में जगह-जगह डस्टबिन लगवाए गए थे। इस प्रोजेक्ट में करीब 35 लाख रुपये के घोटाले का आरोप लगा। एफआईआर भी दर्ज हुई। लेकिन शहर में लगाए गए एक भी डस्टबिन की निगरानी करने में निगम कामयाब नहीं हो पाया।
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योजना- 4 
निगम प्रशासन ने शहर में जगह-जगह सड़क किनारे और खाली स्थानों पर अस्थायी कूड़ा घरों को खत्म करने, उनकी चारदीवारी कराने, कैमरों से निगरानी रखने के लिए प्लान तैयार किया है। यह प्लान भी अन्य प्लान जैसा ही है। जब निगम प्रशासन अपने कार्यालय में पूर्व में लगे कैमरों की निगरानी नहीं कर पा रहा है, तो वह भला कैसे शहर के कूड़ा घरों पर कूड़ा डालने वालों की निगरानी कर पाएगा। निगम प्रशासन की यह योजना भी कहीं न कहीं सरकारी धन को ठिकाने लगाने जैसी साबित हो रही है। 

योजना- 5 
ओडियन और आबूनाले के ऊपर पार्किंग बनाने के लिए भी निगम अधिकारी अपना प्रस्ताव सार्वजनिक कर चुके हैं। इस प्रस्ताव पर जुबानी किए छह माह बीतने वाले हैं। न तो नालों पर पार्किंग को लेकर कोई प्रपोजल तैयार किया गया है और न ही धरातल पर कुछ दिखाई दिया है।

सभी ने प्रयास किया
शहर में कुछ अच्छा हो इसके लिए अच्छा सोचा जाता है। वह बात अलग है कि किन्हीं कारणों के चलते योजना धरातल पर नहीं आ पाती है। कुछ ऐसे भी मामले होते हैं जिन पर शासन की ही स्वीकृति जरूरी होती है। सभी अधिकारियों ने कुछ अच्छा करने का प्रयास किया है। - मनोज कुमार चौहान, नगरायुक्त

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