जनपद के मीट प्लांटों के भवन मानचित्र स्वीकृत नहीं है। बड़ा सवाल ये है कि जब मानचित्र ही स्वीकृत नहीं है तो अब तक इनका संचालन कैसे होता रहा। तमाम विभाग इन मीट प्लांटों को किस आधार पर एनओसी देते रहे। ऐसे में साफ है कि साठगांठ के खेल में ये अवैध मीट प्लांट न केवल अपना कारोबार चला रहे हैं, बल्कि विदेशों को भी एक्सपोर्ट कर रहे हैं।
‘अमर उजाला’ ने 26 फरवरी के अंक में जनपद के नौ मीट प्लांट संचालन बगैर मानचित्र स्वीकृति के चलने की खबर प्रमुखता से प्रकाशित की थी। जिसके बाद कई सवाल खड़े हुए हैं। आखिर जब मानचित्र ही स्वीकृत नहीं है तो कैसे मीट प्लांटों का संचालन होता रहा। इस मामले में मीट कारोबारियों का कहना है कि उनके प्लांट पुराने हैं, जबकि जिस क्षेत्र में मीट प्लांट हैं, वह 15 साल पहले एमडीए की सीमा क्षेत्र में आया है। बावजूद इसके अभी भी तमाम सवाल ऐसे हैं जो सरकारी तंत्र पर सवाल उठा रहे हैं।
एमडीए नहीं तो जिला पंचायत से होती अनुमति
मीट प्लांट भले ही महायोजना 2021 के तहत 2001 में एमडीए सीमा क्षेत्र में शामिल हुए हों। लेकिन इससे पहले यह जिला पंचायत के सीमा क्षेत्र में तो थे। मीट प्लांट एक औद्योगिक इकाई है। ऐसे में जिला पंचायत से मानचित्र स्वीकृति के साथ जिला उद्योग केंद्र से भी मानचित्र स्वीकृत कराना अनिवार्य था।
कैसे दी इन्होंने अनुमति
मीट प्लांट संचालन के लिए उद्योग विभाग, बिजली, श्रम विभाग, शीतगृह, लोक निर्माण विभाग, पुलिस, प्रदूषण, पशु चिकित्सा विभाग और तहसील से अनुमति लेना आवश्यक है। अब बड़ा सवाल ये उठता है कि जब इन मीट प्लांटाें का भवन मानचित्र ही स्वीकृत नहीं था तो इन विभागों ने कैसे अनुमति दे दी।
भ्रष्टाचार के साये में मीट प्लांट
अवैध कमेलों और मीट प्लांट के खिलाफ कार्य कर रहे सच संस्था के अध्यक्ष संदीप पहल एडवोकेट का कहना है कि वह लगातार इन अवैध कमेलों और मीट प्लांटों के खिलाफ शासन-प्रशासन में शिकायत करते रहें हैं। लेकिन मोटे मुनाफे के इस कारोबार में सरकारी तंत्र भी साठगांठ में लिप्त है, और अवैध मीट प्लांटों को संचालित करा रहा है।