शाकाहारी मछली की प्रजाति तैयार होने में करीब चार-छह माह का समय लगता है जबकि मांगुर चार माह के अंतराल में दोगुने आकार की हो जाने से बाजार में भेजने लायक हो जाती है। प्रतिबंधित होने के कारण मांगुर का बीज भी मछली की अन्य प्रजातियों की तुलना में सस्ती दरों पर मिल जाता है।
मत्स्य पालकों को सिर्फ लागत और वजन से सरोकार रहता है। यही वजह है कि जिले के गांव चिंदौड़ी, करनावल, रासना, डूंगर, खिवाई, नारंगपुर, जसड़ सुलताननगर, मीरपुर, हर्रा, भूनी, गोटका, रोहटा आदि में मांगुर प्रजाति तेजी से पनप रही है। यही तर्क देकर सरकार इस पर प्रतिबंधित कर पूरी तरह से रोक लगा चुकी है। मगर कुछ स्वार्थी लोग मोटे मुनाफे के लिए तालाबों में अब भी इसका पालन कर रहे हैं जिससे तालाबों का पानी दूषित हो चला है।
इसके बावजूद प्रशासन आंखें मूंदे बैठा है। विदित रहे कि लगभग चार साल पहले इसके मेरठ में पाये जाने पर प्रशासन ने बडे़ पैमाने पर कार्रवाई कर भारी मात्रा मे मछलियों को नष्ट कर दिया था।
वंशानुगत रोगों को बढ़ावा
मांगुर मछली खाने से मनुष्य में सबसे ज्यादा शारीरिक एलर्जी, फेफड़ों एवं आंतों में संक्रमण, हृदय रोग, डायबिटीज, आर्थराइटिस जैसे वंशानुगत रोगों को बढ़ावा मिलता है।
- डॉ. सुधीर कुमार, चिकित्सा प्रभारी, सीएचसी रोहटा
सेहत बिगड़ने का खतरा
मांगुर मछली सभी राज्यों में प्रतिबंधित है। यह मछली मांसाहारी प्रवृत्ति की है। यह मछली सड़ा गला मांस खाती है जिसकी वजह से जलीय पर्यावरण असंतुलित हो जाता है। इसके खाने से लोगों की सेहत बिगड़ने का भी खतरा रहता है। यदि किसी स्थान पर इस प्रजाति का पालन किया जा रहा है तो छापा मारकर कार्रवाई की जाएगी।
- रामकुमार सोलंकी, मत्स्य पालन अधिकारी
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