मेरठ में परिवार के साथ बैठी महशर।
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मूक बधिर महशर के मिलने की खुशी में शुक्रवार को परिवार ने ईद मनाई। खुशियों की वजह कई हैं। पहली यही कि तीन साल पहले बिछड़ी बेटी आखिरकार मिल गई। दूसरी अहम यह कि महशर अब पढ़ लिख गई है। शुक्रताल स्थित आश्रम में महशर ने आशा नाम से शिक्षा ली। खुद परिवार वाले स्वीकारते हैं कि इतनी अच्छी शिक्षा तो उसे हम भी नहीं दे पाते। किस्मत का खेल भी अजब ही है।
आठ साल की बालिका महशर परिवार से बिछड़ी, लेकिन उसकी किस्मत में शायद बेहतरी ही लिखी थी। भटकते हुए वह शुक्रताल स्थित आश्रम में पहुंच गई। जहां उसे आशा बनाकर अच्छी शिक्षा दी गई। 11 साल की महशर अब साक्षर हो चुकी है, यह जानकर परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं है। उसको देखने के लिए शुक्रवार को दिन भर पचपेड़ा गांव में लोगों की भीड़ लगी रही। रिश्तेदार और शुभचिंतकों भी महशर से मिलने पहुंचे। परिवार का कहना कि तीन साल में उनकी बेटी की आश्रम में किस्मत ही बदल गई।
शायद इतनी अच्छी शिक्षा परिवार भी नहीं दे पाता। मां इशरत ने बताया उनकी बेटी महशर का घर पर मन नहीं लग रहा। वह अभी उदास सी है। वह बोल नहीं सकती। लोग बार-बार उससे लिखवाकर देखते है। उसकी लेखनी देखकर हर कोई प्रभावित हो रहा है। महशर ने लिखकर बताया कि परिवार से बिछड़ने के बाद वह दो दिन एक पुजारी के घर पर रही, जिसने उसको आश्रम में छोड़ा था।
आश्रम से लौटने के बाद महशर अपनी आश्रम की सहेलियों को नही भुला पा रही है। अंगुलियों से की पहचान महशर उर्फ आशा की मां इशरत जहां ने बताया कि वह तीन साल बाद देखने पर बेटी को पहचान नही सकी थी। उसने तुरंत उसके दोनो पैर देखे। इशरत ने कहा कि महशर के पैरों की अंगुलियां जुड़ी हैँ। जिससे उसकी सही पहचान हुई।