आलू के उत्पादन में गिरावट और बाजार में कम दाम मिलने से मेरठ के किसान आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। हालात यह हैं कि किसानों को मुनाफा तो दूर, अपनी लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। किसानों का कहना है कि प्रशासन की ओर से भी इस समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
मेरठ में करीब आठ हजार हेक्टेयर भूमि पर आलू की खेती की जाती है। इस वर्ष मौसम और अन्य कारणों से फसल की पैदावार कम हुई है, जिससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ा है।
उत्पादन में आई गिरावट
पिछले वर्ष प्रति बीघा करीब 25 क्विंटल आलू का उत्पादन हुआ था, लेकिन इस बार फसल कमजोर होने के कारण पैदावार घटकर लगभग 15 क्विंटल प्रति बीघा रह गई है।
वहीं बाजार में आलू का भाव केवल 500 से 700 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहा है, जो किसानों की लागत से काफी कम है। ऐसी स्थिति में किसान घाटे में खेती करने को मजबूर हैं। कई किसान शीतगृह में आलू रखने से भी डर रहे हैं, क्योंकि यदि बाद में 1300 से 1400 रुपये प्रति क्विंटल का भाव नहीं मिला तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
पांच बीघा में इतना आता है खर्च
पांच बीघा खेत में आलू की बुवाई से लेकर खुदाई तक का कुल खर्च करीब 51150 रुपये आता है। इसमें खेत की जुताई पर लगभग 4700 रुपये और मशीन से बुवाई पर करीब 2000 रुपये खर्च होते हैं।
इसके अलावा 10 क्विंटल आलू के बीज की कीमत लगभग 18000 रुपये पड़ती है। पांच बोरे डीएपी पर 6750 रुपये, एक बोरा पोटाश पर 1850 रुपये और कैल्शियम तथा अन्य दवाओं पर करीब 2000 रुपये खर्च होते हैं।
पांच बोरे यूरिया पर करीब 1350 रुपये तथा पलेवा और सिंचाई पर लगभग 3500 रुपये खर्च होते हैं। आलू की खुदाई पर करीब 11000 रुपये का खर्च आता है।
उत्पादन और आय का गणित
पांच बीघा खेत में इस बार कुल लगभग 75 क्विंटल आलू का उत्पादन हुआ है। मंडी में वर्तमान भाव 500 से 700 रुपये प्रति क्विंटल है। इस हिसाब से किसान की कुल आय लगभग 37500 से 52500 रुपये के बीच रहती है।
यह आय कुल लागत 51150 रुपये के बराबर या उससे कम है। ऐसे में किसानों को अपनी मेहनत और पूंजी का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है।
किसानों की बढ़ी चिंता
अतराडा के किसान दिनेश त्यागी, जो हर वर्ष 100 बीघा से अधिक आलू की खेती करते हैं, बताते हैं कि इस बार उत्पादन काफी कम हुआ है और बाजार में भाव भी बेहद कम हैं।
उनके अनुसार व्यापारी खेत से ही 500 से 700 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से आलू खरीद रहे हैं। किसान मजबूरी में सस्ते दामों पर फसल बेचने को विवश हैं। यदि शीतगृह में आलू रखा जाए तो किराया और भाड़ा अलग से देना पड़ेगा। यदि बाद में भी अच्छे दाम नहीं मिले तो किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।