सरधना। जैन धर्म के संघ शिरोमणि आचार्य श्री 108 विमर्श सागर महाराज का कस्बे में मंगल प्रवेश हुआ।
सरधना। जैन धर्म के संघ शिरोमणि आचार्य विमर्श सागर महाराज का शुक्रवार को कस्बे में मंगल प्रवेश हुआ। भक्तों ने संत का हर्षोल्लास से स्वागत किया और गुरुदेव के स्वागत में नगर को भव्य रूप से सजाकर मंगल कलश लेकर आरती उतारी। बताया कि आचार्य का सरधना में यह दूसरा आगमन है। इससे पूर्व वर्ष 2014 में उन्होंने संघ सहित यहां पदार्पण किया था। इस बार 33 पिच्छीधारी संतों का विराट संघ साथ है। नगर में शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें जैन मंदिरों के दर्शन के साथ धर्म ध्वनि गुंजायमान होती रही।
पूर्व से विराजमान आचार्य भारत भूषण मुनिराज ने भावलिंगी संत विमर्श सागर का आत्मीय स्वागत किया। दोनों संतों के मध्य मिलन से श्रद्धालुओं के लिए अलौकिक क्षण बन गया। आचार्य ने कहा कि जब तक संत आपस में मिलते रहेंगे, जैन धर्म इसी तरह आगे बढ़ता रहेगा। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वह भी संयम और साधना के मार्ग पर चलकर जीवन को सार्थक बनाएं। धर्मसभा में आचार्य ने कहा कि संसार में प्रत्येक जीव सुख चाहता है, किंतु जब तक दुख एवं दुख के कारण दूर नहीं होंगे, तब तक सुख कल्पना मात्र है। वास्तविक सुख नहीं है।
मान लीजिए, आप धूप में खड़े हैं तो निश्चित है कि आपकी परछाई आपके ही समीप रहेगी। उस परछाई पर आपके ही सामने कोई कुचले अथवा कुछ भी करे तब भी आप पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ेगा, किंतु आपके सामने कोई आपके मनपसंद पेन को हानि पहुंचाए तो आपके अंदर एक विशेष हलचल पैदा हो जाएगी। जरा विचार करें कि परछाई भी आपकी है और पेन भी आपका है। आपकी परछाई यदि कीचड़ में भी पड़ी हो तो भी आप सहज रहते हैं, किंतु आपका पेन यदि कीचड़ में पड़ जाए तो आपको कष्ट होने लगता। है। कारण साफ है पेन से आपको राग-है, इसलिए उसकी हानि आपको आंदोलित कर देती है, जबकि परछाई से कोई राग नहीं है।