अवैध आरा मशीन संचालन के लिए जोड़-तोड़ की बड़ी नीति अपनाई जा रही है। जिले में वैध आरा मशीनों के लाइसेंस मोटी रकम पर बेचे जा रहे हैं। विभागीय अधिकारियों की साठगांठ से लाइसेंस बेचे जाने के बाद भी उसी स्थान पर आरा मशीन चलाई जा रही है। इससे वैध आरा मशीन भले ही अवैध मशीन बन जाती हो, लेकिन अधिकारियों की नजर में यह वैध ही रहती है।
इसका जीता जागता उदाहरण खत्ता रोड़ पर संचालित मशीन पर देखा जा सकता है। मशीन संचालक ने कई साल पहले अपना लाइसेंस 15 लाख रुपये में किसी अन्य व्यक्ति को बेच दिया था। इसके बाद भी अब यह व्यक्ति विभागीय सांठगांठ से बड़े पैमाने पर लकड़ियों का कटान कर रहा है। शहर और देहात दोनों ही क्षेत्रों में ऐसे कई मामले हैं, जिन्होंने लाइसेंस बेच कर उसी स्थान पर अवैध आरा मशीन का संचालन किया हुआ है।
स्टॉक रजिस्टर ही गायब
वैध आरा मशीन संचालक को लकड़ी का स्टॉक रजिस्टर रखना होता है। इसमें लकड़ी की किस्म और मात्रा दर्ज होती है। इसी के माध्यम से मंडी समिति टैक्स वसूलती है। लेकिन अधिकांश आरा मशीनों पर स्टॉक रजिस्टर नहीं है। मंडी समिति और सेल टैक्स अधिकारी भी इस रजिस्टर को चेक नहीं करते है। इससे राजस्व में गड़बड़ी की जाती है।
विद्युत कनेक्शन भी नहीं
अधिकांश अवैध आरा मशीन शहर के संवेदनशील इलाकों में चल रही हैं। यहां पर लाइन लॉस सर्वाधिक है। सूत्रों के अनुसार बड़ी संख्या में आरा मशीनों पर विद्युत कनेक्शन तक नहीं है। कटिया डालकर काम चलाया जा रहा है। कई आरा मशीनें घरेलू कनेक्शन पर चल रहीं है।
जांच में उतरवा दिया जाता है पट्टा
वन विभाग के कर्मचारी इस खेल में पूरी तरह शामिल हैं। जब भी अवैध आरा मशीनों को लेकर कोई अभियान चलता है, तो कर्मचारी अवैध आरा मशीनों के पट्टे उतरवाकर उसे बंद दिखवा देते है। इसके बाद शपथ पत्र दिया जाता है कि एक भी आरा मशीन अवैध रुप से संचालित नहीं है। नियमानुसार विभाग को अवैध आरा मशीन पकड़ते ही उसे उखाड़ देना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं होता है। चंद दिन मशीन बंद रहने के बाद फिर से आरा चलना शुरू हो जाता है।
वर्जन..........
अवैध आरा मशीनों के खिलाफ टीम गठित कर अभियान चलाया जायेगा। जो भी मशीनें अवैध रुप से चलती हुई पकड़ी जाएंगी, उन्हें उखाड़कर सील किया जायेगा।
पंकज यादव, जिलाधिकारी मेरठ।