मेरठ में हाजी याकूब कुरैशी लोकसभा प्रभारी हैं। यहां बसपा मुस्लिम-दलित समीकरण पर दांव खेल रही है। अलीगढ़ बसपा के खाते में है। यहां बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग की और जाट कार्ड खेलने की तैयारी है। यहां खैर और बरौली दो विधानसभाएं जाट बाहुल्य हैं। अलीगढ़ विधानसभा में मुस्लिमों की संख्या काफी है।
गाजियाबाद में गठबंधन वैश्य या ब्राह्मण पर दांव लगा सकता है। यहां एक पुराने ब्राह्मण नेता मजबूती से दावेदारी कर रहे हैं। आगरा भी बसपा के हिस्से में हैं। यहां दलित मुस्लिम समीकरण के साथ ओबीसी पर पैनी नजर है।
कांग्रेस के उम्मीदवार पर नजर
पश्चिम की इन सीटों पर कांग्रेस का अहम रोल होगा। कांग्रेस यदि गठबंधन के साथ लड़ी तो अलग समीकरण बनेंगे। यदि अलग लड़ी तो भाजपा और गठबंधन दोनों का ही खेल बिगाड़ने में कसर नहीं छोड़ेगी। कांग्रेस कई अहम सीटों पर सेलिब्रिटी को चुनाव मैदान में उतारकर चौंका सकती है। मेरठ के जातिगत समीकरण की बात करें, तो यदि कांग्रेस ने मुस्लिम उम्मीदवार पर दांव खेल दिया तो गठबंधन के पसीने छूट जाएंगे। यदि वैश्य या ब्राह्मण पर दांव खेला तो भाजपा को भारी पड़ सकता है। यही गणित पश्चिम की अधिकतर सीटों पर रहेगा।
कम मार्जन वाली सीटों पर निगाह
संभल, अमरोहा, मुरादाबाद, रामपुर में पिछले चुनाव में हार-जीत का मार्जन कम था। ऐसे में गठबंधन इन सीटों पर उम्मीद लगाए है। पार्टी थिंक टैंक का मानना है कि इन सीटों पर वह अच्छी स्थिति में होगा।
क्या फिर से हैट्रिक लगा पाएगी भाजपा
मेरठ भाजपा का गढ़ माना जाता रहा है। यह पश्चिम की राजनीति का केंद्र भी है। देश में हुए पहले लोकसभा चुनाव में यहां कांग्रेस का परचम लहराया, लेकिन 1967 में सोशलिस्ट पार्टी ने यहां कांग्रेस को मात दी। 1971 में एक बार फिर कांग्रेस जीती। अगला चुनाव इमरजेंसी के बाद हुआ। जनता में आक्रोश था तो यह सीट जनता पार्टी के खाते में चली गई। हालांकि, 1980, 1984 में कांग्रेस की ओर से मोहसिना किदवई ने जीती। 1989 में जनता पार्टी विजयी हुई। 1990 के दशक में देश में चले राम मंदिर आंदोलन का मेरठ में सीधा असर दिखा। इसी के बाद यह सीट भाजपा का गढ़ बन गई। 1991, 1996 और फिर 1998 में यहां से लगातार भाजपा के ठाकुर अमरपाल सिंह जीते। उसके बाद 1999 में यह सीट कांग्रेस के अवतार सिंह भड़ाना ने जीत ली। 2004 में बसपा के हाजी शाहिद अखलाक ने बाजी मारी। उसके बाद 2009 और 2014 में लगातार भाजपा से राजेंद्र अग्रवाल ने विजय पताका फहराई।
25 मार्च तक नामांकन और 11 अप्रैल को मतदान
जनपद में लोकसभा चुनाव 11 अप्रैल को होगा। हालांकि मेरठ जनपद में सात विधानसभा सीटों में से चार सीट मेरठ-हापुड़ लोकसभा में हैं। हस्तिनापुर विधानसभा बिजनौर लोकसभा, सरधना विधानसभा मुजफ्फरनगर लोकसभा में और सिवालखास विधानसभा बागपत में आती है। सभी में चुनाव एक ही दिन होगा। 18 मार्च को निर्वाचन की अधिसूचना जारी होगी और 25 मार्च तक नामांकन होंगे। 26 को नामांकन पत्रों की जांच, 28 मार्च को नाम वापसी और 11 अप्रैल को मतदान होगा। मतगणना 23 मई होगी।
जनपद में 25 लाख वोटर
मेरठ जनपद में कुल 25,18,404 मतदाता हैं, जो 1198 मतदान केंद्रों के 2739 बूथों पर मतदान करेंगे। इनमें सिवालखास विधानसभा में 3,25,952 मतदाता, सरधना में 3,42,002, हस्तिनापुर में 3,33,458 मतदाता हैं। मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट के अंतर्गत आनी वाली किठौर विधानसभा में 3,50,652, मेरठ कैंट में 4,12,764, मेरठ शहर में 3,04,002 और दक्षिण विधानसभा में 4,49,574 मतदाता हैं।
आज जिलाधिकारी करेंगे प्रेस वार्ता
लोकसभा चुनाव को लेकर जिलाधिकारी एवं जिला निर्वाचन अधिकारी अनिल ढींगरा लोकसभा सामान्य निर्वाचन प्रक्रिया की मीडिया को जानकारी देंगे। वह आदर्श चुनाव आचार संहिता सहित जिले में चुनावी तैयारी को लेकर विस्तृत जानकारी देंगे।
पिछली बार पश्चिम की सभी सीटें जीती थी भाजपा
भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में पश्चिम यूपी की सभी 14 सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन गठबंधन की मौजूदगी में इस बार ऐसा करना लोहे के चने चबाने जैसा होगा। गठबंधन भी अपनी खोई सीटों को दोबारा पाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगा। पिछले चुनाव में पांच मार्च को चुनाव आचार संहिता लागू हुई थी। पहले चरण में पश्चिम यूपी की 10 सीटों पर चुनाव हुआ था। 10 अप्रैल को मतदान हुआ था। इस बार पहले चरण में आठ सीटें शामिल हैं, जिन पर 11 अप्रैल को मतदान होगा।
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