सहारनपुर में नहीं इसका असर
भाजपा की तरफ से कैराना पलायन और वापसी को मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है। लोग यह तो मान रहे हैं कि सरकार बदलने के बाद बदमाशों के खिलाफ कार्रवाई हुई और हालात सुधरे हैं। लेकिन चुनाव में इसका असर होगा, यह मानने को तैयार नहीं हैं। नुमाइश कैंप निवासी मुकेश का कहना है कि कानून-व्यवस्था में सुधार हुआ है, इस चुनाव में कैराना पलायन मुद्दा बनता नहीं दिख रहा है। वहीं शिवाजीनगर निवासी राजकुमार बोले कि अपराध कम हुए हैं, चुनाव में विकास मुद्दा रहेगा। सहजवा गांव निवासी बिट्टू ने भी पलायन मुद्दे को अब केवल कैराना तक ही सीमित बताया।
मुख्य बिंदु
- 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे के बाद गैर भाजपा दलों के सारे समीकरण ध्वस्त हो गए थे। 2014 में भाजपा यूपी में बड़ी ताकत बनकर उभरी थी।
- 2016 में भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने पहले 250 परिवारों, बाद में 346 और कांधला के 60 परिवारों की सूची जारी कर पलायन का मुद्दा उठाया।
- 2018 में हुकुम सिंह के निधन के बाद हुए उप चुनाव में भी यह मुद्दा उठा, लेकिन इस बार यह मुद्दा उसके काम नहीं आया।
- 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा फिर मुद्दे को गर्मा रही है। इस बार कैराना पलायन कर गए लोगों की वापसी को मुद्दा बनाया जा रहा है।
दंगे और पलायन का जिक्र जरूर, पर मुद्दा नहीं
लूंब गांव के अरविंद कुमार का कहना है कि छपरौली विधानसभा क्षेत्र कैराना के नजदीक है, लेकिन बागपत में पलायन का मुद्दा नहीं है। बड़ौत निवासी धर्मेंद्र तोमर का कहना है कि मुजफ्फरनगर दंगे के जिक्र से वोट बैंक का ध्रुवीकरण नहीं होगा। बागपत में भी दंगे के दौरान कई वारदातें हुई थीं, लेकिन इस बार मुद्दा दंगा या पलायन नहीं है। अग्रवाल मंडी टटीरी निवासी सतीश कहते हैं कि कैराना और मुजफ्फरनगर दंगे का इस बार यहां असर नहीं दिख रहा है।
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