बेहट
इस सीट पर मौजूदा विधायक कांग्रेस के नरेश सैनी हैं। 2014 में बेहट क्षेत्र में कांग्रेस को 89920 वोट मिले थे, जबकि दूसरे नंबर पर भाजपा को 79365 वोट हासिल हुए थे। बसपा को 50582 और सपा को 16978 वोट मिले थे। मौजूदा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी को यहां कितने वोट मिलते हैं, उससे विधायक की मेहनत का पता चलेगा।
सहारनपुर
सहारनपुर नगर सीट से संजय गर्ग सपा विधायक हैं। 2014 के चुनाव में इस क्षेत्र में भाजपा को 133577 वोट मिले थे, जबकि दूसरे नंबर पर कांग्रेस को 109793 वोट मिले थे। बसपा को 15077 और सपा को 6718 वोट मिले थे। अब बसपा और सपा गठबंधन में हैं, तो नगर विधानसभा क्षेत्र में गठबंधन प्रत्याशी को कितने वोट मिलेंगे, उससे नगर विधायक की मेहनत का अंदाज होगा।
सहारनपुर देहात
इस सीट पर मौजूदा विधायक कांग्रेस के मसूद अख्तर हैं। 2014 के चुनाव में यहां कांग्रेस को 84823 वोट मिले थे, जबकि दूसरे नंबर पर भाजपा को 68623, बसपा को 59742 और सपा को 10324 वोट मिले थे। अब कांग्रेस प्रत्याशी को इस क्षेत्र में फिर से बढ़त मिलती है या नहीं, यह मतणना से पता चलेगा और तय करेगा कि विधायक की मेहनत कितनी असर दिखा पाई।
रामपुर मनिहारान
इस सीट पर मौजूदा विधायक भाजपा के देवेंद्र निम हैं। 2014 के चुनाव में यहां भाजपा को 86645 वोट मिले थे, जबकि दूसरे नंबर बसपा को 63192, कांग्रेस को 56132 और सपा को 7882 वोट मिले थे। यहां भी भाजपा फिर से पहले पायदान पर रहती है या फिर विधायक की मेहनत में कोई कमी रही, इसका पता मतगणना से चलेगा।
देवबंद
यहां से मौजूदा विधायक भाजपा के कुंवर ब्रजेश सिंह हैं। 2014 के चुनाव में यहां भाजपा को 104051 वोट मिले थे, जबकि दूसरे नंबर पर कांग्रेस को 67148, बसपा को 46106 और सपा को 10834 वोट मिले थे। भाजपा प्रत्याशी को फिर से यहां नंबर वन पर रखना क्षेत्रीय विधायक की मेहनत साबित करेगा।
पदाधिकारियों को भी देना होगा जवाब
सहारनपुर। लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए विधायकों के साथ ही पार्टी पदाधिकारियों को भी लक्ष्य दिया गया था। बूथ प्रबंधन मजबूत करने को कहा गया था। चुनाव परिणाम साबित करेंगे कि पार्टी पदाधिकारियों ने प्रत्याशियों के लिए कितना पसीना बहाया, या फिर मेहनत के नाम पर प्रत्याशी को गुमराह करते रहे।
चर्चा यह भी है कि लोकसभा चुनाव के परिणाम सामने आने पर पार्टी पदाधिकारियों को लेकर भी फैसला होगा। यदि पदाधिकारियों के स्तर पर किसी तरह की कमजोरी की वजह से प्रत्याशी की हार हुई, तो ऐसे पदाधिकारियों की कुर्सी छिन भी सकती हैं।