यूं ही मेहरबान नहीं हुई कांग्रेस
साल 2009 का लोकसभा चुनाव भाजपा और रालोद ने साथ मिलकर लड़ा। चुनाव के बाद कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए कुछ सांसदों की जरूरत पड़ सकती है। रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह भाजपा का साथ छोड़कर जाट आरक्षण दिलाने का दावा कर कांग्रेस सरकार में शामिल हुए।
दंगे से बढ़ी नजदीकियां
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद कांग्रेस से रालोद की नजदीकी रही। साल 2014 का चुनाव साथ मिलकर लड़ा। यही नहीं राजस्थान के चुनाव में भी कांग्रेस और रालोद साथ मिलकर लड़े और रालोद के अकेेले विधायक वहां की सरकार में मंत्री है।
नब्बे के दशक तक कांग्रेस ने दिखाया दम
बागपत सीट पर कांग्रेस के टिकट पर साल 1952 में खुशीराम, 1957 में विष्णुशरण दुबलिश, 1962 में किशन चंद शर्मा, 1967 में रामचंद्र विकल सांसद चुने गए। वर्ष 1977 से 1991 तक के लोकसभा चुनाव में यहां कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही। इसके बाद लगातार वोट बैंक गिरता चला गया।
अमर उजाला ने जताई संभावना
अमर उजाला ने छह मार्च के अंक में कांग्रेस की रणनीति पर समाचार प्रकाशित किया। संभावना जताई थी कि बागपत से कांग्रेस प्रत्याशी नहीं उतारेगी।
निर्दलीय मुस्लिम बन सकते हैं भाजपा की उम्मीद
कांग्रेस के फैसले के बाद भाजपा के रणनीतिकार फिर से मंथन में जुटे हैं। राजनीतिक सूत्रों को संभावना थी कि यदि कांग्रेस किसी मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारती है तो गठबंधन को नुकसान होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब निर्दलीय मुस्लिम प्रत्याशियों पर भाजपा की उम्मीद रहेगी।
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