- फलावदा में अंजुमन इर्तिका ए अदब ए उर्दू की मासिक काव्य गोष्ठी
संवाद न्यूज एजेंसी
फलावदा। मदरसा जमालुद्दीन दरबार में साहित्यिक संस्था अंजुमन इर्तिका ए अदब ए उर्दू ने मासिक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया। यह गोष्ठी सैय्यद अंसार अली मुज़्तर की स्मृति में समर्पित थी। अध्यक्षता मेहमान शायर सदाकत हुसैन देवबंदी और संचालन अनवार उल हक शादां ने किया।
काव्य गोष्ठी के प्रारंभ से पहले अनवार उल हक शादां ने सैय्यद अंसार अली मुज़्तर के जीवन पर प्रकाश डाला। अंजुमन के सरपरस्त अनवार उल हक शादां और सद्र फैयाज अली नादिर ने अतिथियों को सम्मानित किया। गोष्ठी का प्रारंभ मुहम्मद आकिब ने ईश्वर की वंदना से किया। महफूज उर रहमान माहिर और खलील बशर ने नाते पाक प्रस्तुत की। अनवार उल हक शादां ने अपनी रचना पढ़ी फेंकने वाले जरा सोच समझ कर फेंकें, पत्थरों को ये नहीं इल्म के सर किसका है। सदाकत देवबंदी ने कहा कब्जा मस्जिद पे नहीं, कल्ब पे करना था तुम्हें। तुमको आया ही नहीं हम पे हुकूमत करना। अहमद मुजफ्फरनगरी ने पढ़ा कहां अपनों का होता है करम अब, किनारों ने भी किनारा कर दिया है। एडवोकेट इरशाद बेताब ने अपनी रचना सुनाई खुदा ने दी है वो तासीर तेरे चेहरे को, पड़े जो अक्स तेरा आईने संवर जाएं।
मिर्जा हसीमुद्दीन हमदम ने पढ़ा ऐश व मुसीबत हसरतों अरमां, जीस्त तिरे उन्वान बहुत हैं। फैयाज अली नादिर ने अपनी रचना प्रस्तुत की मिटा सको तो मिटा दो ये नफरतें दिल से, मुहब्बतों को मिटाने से कुछ नहीं होगा। सैयद नायाबुद्दीन नायाब ने कहा कौन डसता है आस्तीनों से, अब तो पहचान हो गई होगी। अब्दुस समद साहिर ने अपनी रचना सुनाई पैसों के लेनदेन में ईमान बिक गया, मुंसिफ भी जालिमों की हिमायत में आ गए।
खलील अहमद खलील ने पढ़ा सच बोलने का हुक्म भी देता है बार-बार। खंजर भी रख रहा है वो मेरी जबान पर। सलीम खान सलीम ने अपनी गजल प्रस्तुत की तेरी जुल्फों को सुलझाया हदों तक, तेरी जुल्फों में फिर भी खम रहा है। निसार अहकर फरीदी ने अपनी हास्य रचना से श्रोताओं को गुदगुदाया। महफूज उर रहमान माहिर ने भी अपनी रचना पढ़ी। मिर्जा मिनहाजुद्दीन मोनिस की एनसीआरटी काव्य मंजरी में सम्मिलित रचना ने भी श्रोताओं का मन मोह लिया।