जो विश्वविद्यालय बंद हो चुके हैं। जिनका अब कोई अस्तित्व नहीं रहा, उनकी फर्जी मार्कशीट बनवाकर दलालों ने छात्रों को मेरठ कॉलेज में दाखिले दिलवा दिए। कानून की पढ़ाई में हुए इस फर्जीवाड़े का खुलासा कॉलेज द्वारा कराई गई जांच में हुआ है।
कई विश्वविद्यालयों ने एलएलबी प्रथम वर्ष के प्रवेश में लगाई गई मार्कशीटों का उनके यहां कोई रिकॉर्ड नहीं होने की रिपोर्ट भेज दी है। ऐसे में पिछले साल की तरह मेरठ कॉलेज में दलाल इस बार भी दाखिला कराकर छात्र-छात्राओं को लूटने में कामयाब हो गए। 25 से 30 ऐसे फर्जी दाखिलों की रिपोर्ट कॉलेज ने विवि को भेजी है। अगर इस बार भी मामले में रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई गई तो दलाल आगे भी सक्रिय रहकर छात्रों को लूटते रहेंगे।
मेरठ कॉलेज में तीन साल से लगातार फर्जी मार्कशीट लगाकर दाखिले लेने के मामले सामने आ रहे हैं। कॉलेज प्रशासन ने पिछले साल 70 दाखिले रद्द भी किए, लेकिन दलालों का रैकेट खत्म नहीं हुआ। इस बार भी करीब 50 दाखिले संदेह के घेरे में आए हैं। इनमें अधिकतर में नॉर्थ ईस्ट के कई विवि की मार्कशीट लगाई गई थी।
कॉलेज प्रशासन ने इन विवि को मार्कशीट की जानकारी भेजकर वेरिफिकेशन कराया। विवि ने जो रिपोर्ट भेजी वह चौंकाने वाली है। इसमें कई विश्वविद्यालय तो अब बंद हो गए हैं। ऐसे में साफ है कि यह मार्कशीट फर्जी बनवाई गई। कई विवि ने रिपोर्ट भेजी है कि उनके यहां इन मार्कशीट का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है।
करीब 30 दाखिलाें के मामले में फर्जीवाड़ा स्पष्ट हो गया है। ऐसे में विवि प्रशासन इन दाखिलों को रद्द कर सकता है। जबकि इन छात्र-छात्राओं के दो पेपर भी हो चुके हैं। बता दें कि एलएलबी में मेरठ कॉलेज में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) से मान्यता पत्र मिलने में देरी होने पर अक्तूबर में दाखिले हुए थे। यहां पर एलएलबी में 300 सीटें हैं।
मुकदमा दर्ज नहीं हुआ तो आगे भी फर्जीवाड़ा करेंगे दलाल
मेरठ कॉलेज में सत्र-2017 में बीए, बीकॉम, बीएससी और एलएलबी में फर्जी मार्कशीट और प्रमाण पत्रों से 500 से ज्यादा दाखिले लेने की जानकारी सामने आई थी। लेकिन इस मामले को दबा दिया गया था। पिछली बार भी कॉलेज प्रशासन को सूचना मिली कि दलालों का बड़ा नेटवर्क सक्रिय है।
ये दलाल पांच से 10 हजार रुपये लेकर कम नंबर वाले छात्रों को शिकार बनाकर उनके फर्जी मार्कशीट पर दाखिले कराते हैं। लेकिन इसके बाद भी थाने में रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई गई। अगर मुकदमा दर्ज हो जाता है तो दाखिले लेने वाले छात्र दलालों का नाम बता देते, इससे कॉलेज में फैले इस रैकेट पर लगाम लगती। ऐसे में इस बार भी अगर मुकदमा दर्ज नहीं हुआ तो यह रैकेट चलता रहेगा।
दलालों ने कम नंबरों वाले छात्रों को एडमिशन दिलाने के लिए नए तरीके ढूंढ लिए हैं। दरअसल, वह दूसरे प्रदेशों के विवि की अधिक नंबर वाली फर्जी मार्कशीट लगाकर रजिस्ट्रेशन करा लेते हैं। दूसरे विवि का ऑनलाइन रिकॉर्ड नहीं है, ऐसे में इनका वेरिफिकेशन भी दाखिले के समय नहीं हो पाता है।