घटते वन, कटते वृक्षों के बाद क्रंकीट के जंगलों के फैलते जाल ने मेरठ को जलसंकट से जूझने की स्थिति पर खड़ा कर दिया है। मेरठ में हर वर्ष 2318.15 हेक्टेयर प्रति मीटर वार्षिक भूजल का दोहन हो रहा है। इसके एवज में पानी के रिचार्ज की विकास दर मानक से बेहद कम कुल 58 फीसदी है। अगर जिले में लगे 52 पीजोमीटर की रिपोर्ट को देखें तो प्री-मानसून की तुलना में पोस्ट मानसून में ही भूजल बढ़ने के बजाय नीचे गिरता जा रहा है। गाजियाबाद, नोएडा, लखनऊ, वाराणसी, कानपुर, इलाहाबाद व आगरा जैसे महानगरों को पछाड़ते हुए मेरठ भूमिगत जल के दोहन में नंबर वन पर है। इन जिलों में 45 से 91 सेमी की दर से भूजल गिरा है, जबकि मेरठ में हर साल 94 सेमी की दर से भूजल में गिरावट हो रही है। मेरठ में 115159.91 हेक्टेयर मीटर की दर से भूजल रिचार्ज होता है। इसके एवज में 80813.99 हेक्टेयर मीटर जल इस्तेमाल हो जाता है। 70.18 फीसदी की दर से भूजल का प्रयोग किया जा रहा है। जिससे संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
इनसेट--एनजीटी के आदेश भी नहीं हुए पूरे
वर्ष 2016 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने प्रदेश सरकार और उप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पश्चिमी उप्र के 154 गांवों में पैक्ड पेयजल उपलब्ध कराने का आदेश दिया था। इसमें मेरठ भी शामिल है। मेरठ में ग्रीन ट्रिब्यूनल के इस आदेश के पालन से पहले गांवों में जल की उपलब्धता का बड़ा संकट है। इसलिए एनजीटी के आदेशों का पालन भी नहीं हो रहा। प्रदेश में मेरठ के भूजल में हर साल 94 फीसदी की गिरावट रिकार्ड की गई है।
भूजल गिरावट की मुख्य वजह
तालाबों पर अवैध कब्जे, वाटर रिचार्ज सिस्टम न होना, रेन वाटर हार्वेस्टिंग प्लांट की कमी, भूमिगत जल संसाधनों की बढ़ती कमी, बरसात में आई गिरावट, औद्योगिक इकाइयों द्वारा बिना अनुमति और अनुमति से अधिक मात्रा में पानी भूमि से निकाला जा रहा है।
मेरठ के 3 ब्लॉक डार्क जोन में
मेरठ मेें 5 ब्लॉक पानी क ी कमी के कारण लाल घेरे में आ चुके हैं। रजपुरा अतिदोहित, खरखौदा, माछरा, परीक्षितगढ़, मेरठ में क्रिटिकल स्थिति है। वहीं दौराला व हस्तिनापुर ब्लॉक भी सेमीक्रिटिकल जोन में पहुंच चुके हैं। इसमें रजपुरा ब्लॉक में भूमि के भीतर जल की मौजूदगी शून्य हो गई है। परीक्षितगढ़, मेरठ सहित अन्य ब्लॉकों में भी माइनस में यह उपलब्धता जा चुकी है। तीन ब्लॉकों के नौ क्षेत्र डार्क जोन में घोषित हो चुके हैं। अतिदोहित क्षेत्र खरखौदा में 5114.41 हेक्टेयर मीटर, रजपुरा में 5164.43 हेक्टेयर मीटर वार्षिक भूजल दोहन हो रहा है। खरखौदा में भूजल की उपलब्धता -298.51 हेक्टेयर प्रति मीटर एवं - 0.02 मीटर प्रति हेक्टेयर शेष है। इसी तरह रजपुरा में कुल -581.12हेक्टेयर मीटर भूजल शेष है। भूजल विभाग के मुताबिक सुरक्षित जलसंचय के लिए भूजल विकास दर 80.51 फीसदी होना चाहिए, लेकिन जानी में यह दर कुल 38 फीसदी, परीक्षितगढ़ में 58, रोहटा में 56, माछरा में 67 व सरधना में कुल 41 फीसदी है। जो खतरे की घंटी बजाती है।