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‘सभी फूलों में कलियां बोलती हैं, समंदर में भी नदियां बोलती हैं...'

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‘सभी फूलों में कलियां बोलती हैं, समंदर में भी नदियां बोलती हैं, मैं लम्हा हूं मुझे महसूस करना, मेरे शेरों में भी सदियां बोलती हैं...’। कवियों ने कविताएं पेश कर नवरस का अमृत बरसाया। मौका था वाल्मीकि जयंती के अवसर पर रविवार को राजकीय स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय में आयोजित काव्य संध्या का।
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डॉ. कृ ष्ण कुमार बेदिल ने समंदर में नदियां बोलती हैं सुनाया। डॉ. रामगोपाल भारतीय ने जिनकी शामिल नहीं भावना, औरों के हंसने रोने में, कोई असर नहीं है, उनके होने या न होने में सुनाया। किशन स्वरूप ने कहा एक जमाना हुआ कुछ किया ही नहीं, जिंदगी से मगर जी भरा भी नहीं। शिवानंद सिंह सहयोगी ने कहा संदर्भों से जुड़े रहे नित, भाषा के सब गांव हमारे। डॉ. अमित पाठक ने अति सुंदर, अति सुंदर रचना सुनाई। बृजराज किशोर राहगीर ने परदेसी प्रियतम जब आएंगे, नयन पलक-पांवडे़ बिछाएंगे, महक उठेगी तन की फूल बगिया, अधर कुंभ अमृत कहलाएंगे सुनाया। यशपाल कौत्सायन ने कहा ऐसी कोई जुगत लगाएं, सारे भ्रम दूर हो जाएं।
संजय कुमार शर्मा ने कभी कोई सुहागिन चेहरे से, पल्ला हटाएगी तुम्हारी याद आएगी सुनाया। डॉ. अरविंद कुमार नावा ने कहा इधर भी देख लेते तुम, उधर भी देख लेते तुम, न होता हादसा गर किधर भी देख लेते तुम। राम लखन पटेल बोले आओ करें इस क्रांति की पावन धरा की वंदना सुनाया। डॉ. विजय पंडित ने कहा दोस्ती या तिजारत, फर्क करना हुआ भारी। सुधीर शर्मा अनुपम ने न उसका नाम पता चल रहा, न काम मुझे सुनाया। डॉ. क्षमा गुप्ता ने जो राहें पहुंचाती नहीं क्षमा, मंजिलों को जानकर, ऐसे रास्तों पर राही का चलना क्या रुक जाना क्या सुनाया। आदर्शिनी श्रीवास्तव ने आज विपत्ति है कल सुलझेगी, वक्त एक सा नहीं रहा।
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डॉ. सरोजिनी तन्हा ने चोट खाना मगर मुस्कराना, अपने हालात से हमने सीखा सुनाया। प्रशांत दीक्षित प्रशांत ने सहे स्वयं ही कष्ट निरंतर, पर दुख अपना नहीं बताया सुनाया। मुख्य अतिथि डॉ. अमित पाठक रहे। अध्यक्षता किशन स्वरूप तथा संचालन संग्रहालय अध्यक्ष पतरू ने किया। हरिओम शुक्ला व स्टाफ ने सहयोग दिया।
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