सरधना। 26 जनवरी 1989। मेरठ और देशभर में गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा था। लाल किले से प्रधानमंत्री का संबोधन रेडियो पर गूंज रहा था और इसी दौरान सरधना थाना क्षेत्र का गांव कपसाड़ खून से लाल हो रहा था। सुबह करीब साढ़े नौ बजे गांव में ऐसा कत्लेआम हुआ जिसने पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश को दहला दिया। सात लोगों की हत्या कर उनके शव गंगनहर में बहा दिए गए। शव कभी बरामद नहीं हो सके। यह वारदात उस समय के सबसे जघन्य अपराधों में शुमार हुई। गांव के लोग आज भी इस पर खुलकर नहीं बोलते। इस वारदात के बाद अब बेटी रूबी के अपहरण और मां सुनीता की हत्या के बाद कपसाड़ गांव एक बार फिर सुर्खियों में है।
दो परिवार, एक गांव और पीढ़ियों की दुश्मनी
इस हत्याकांड की जड़ें वर्षों पुरानी थीं। हरवंश सिंह और रंजीत सिंह के परिवार मूल रूप से कपसाड़ के निवासी नहीं थे। एक पीढ़ी पहले दोनों परिवार गांव में आकर बसे थे। धीरे-धीरे आपसी विवाद बढ़ता गया और फिर यह दुश्मनी खूनी संघर्ष में बदल गई। बताया जाता है कि रंजीत सिंह के बेटों द्वारा हरवंश सिंह की हत्या कर दी गई थी। इसी घटना ने दोनों परिवारों के बीच खून के बदले खून की परंपरा को जन्म दिया। इसके बाद गांव लगातार तनाव में रहा। खेतों में आगजनी, घरों पर हमले और खुलेआम हथियारों का प्रदर्शन आम हो गया था।
25 जनवरी की रात और 26 जनवरी की सुबह
ग्रामीणों के अनुसार, 25 जनवरी 1989 को हरवंश सिंह के बेटे विजयपाल सिंह, सतपाल सिंह, श्रीपाल सिंह और पृथ्वी सिंह गांव में पहुंचे थे। वे खुले तौर पर नहीं बल्कि गुप्त ठिकानों पर रहकर अपने विरोधियों की गतिविधियों पर नजर रख रहे थे। 26 जनवरी की सुबह रंजीत सिंह के बेटे सतपाल सिंह, हरि सिंह और उनके साथ करीब आठ लोग एक घर में बैठे प्रधानमंत्री का भाषण सुन रहे थे। उन्हें अंदेशा था कि हमला हो सकता है लेकिन समय और जगह का अनुमान नहीं था।
कुछ ही मिनटों में उजड़ गईं सात जिंदगियां
सुबह होते ही हमलावरों ने अचानक धावा बोल दिया। गोलियों और धारदार हथियारों से हमला हुआ। गांव के लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले सात लोगों की हत्या की जा चुकी थी। शवों को भैंसा-बुग्गी में लादकर गंगनहर में डाल दिया गया। यह वह दौर था जब नहर में शव फेंक देना अपराधियों का आम तरीका माना जाता था। इस हत्याकांड में विजयपाल, सत्यपाल, सीरिया, पिरथी, मनवीर, राकेश व शफीक इंचौली के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था।
पुलिस आई, गांव घिरा, लेकिन गवाह नहीं मिला
घटना के बाद कपसाड़ को कई थानों की पुलिस और वरिष्ठ अधिकारियों ने संगीनों के साए में घेर लिया। तलाशी अभियान चला, पूछताछ हुई लेकिन गांव में सन्नाटा पसरा रहा। न कोई प्रत्यक्षदर्शी सामने आया न किसी ने बयान देने की हिम्मत दिखाई। डर और दबाव के बीच पूरा गांव खामोश रहा। हत्या का मुकदमा रंजीत सिंह पुत्र मनफूल की ओर से दर्ज कराया गया। आरोपी गिरफ्तार हुए, जेल भी गए लेकिन साक्ष्यों और गवाहों के अभाव में बाद में रिहा होकर वापस लौट आए।
आज भी जिंदा है वह डर
तीन दशक से अधिक समय बीत चुका है लेकिन कपसाड़ गांव के बुजुर्ग आज भी उस दिन को याद कर सिहर उठते हैं। नई पीढ़ी ने यह किस्से सुने हैं, देखे नहीं लेकिन गांव की पहचान पर इस घटना की छाया आज भी मौजूद हैं। यह हत्याकांड सिर्फ सात लोगों की मौत की कहानी नहीं है बल्कि उस दौर की ग्रामीण हिंसा, पुलिस व्यवस्था की सीमाओं और समाज की चुप्पी का भी आईना है। 26 जनवरी 1989 का वह दिन आज भी कपसाड़ के इतिहास में एक ऐसा काला अध्याय है। इसे न गांव भूल पाया और न कानून पूरी तरह सुलझा पाया।